मधुमेह से बचाव के घरेलू उपाय

Home remedy for diabetes

मधुमेह स्वयं में कोई रोग न होकर अन्य महारोगों का जनक है | इसकी पूर्ण रूप से चिकित्सा असंभव है Ayurvedic Medicine For Diabetes In Hindi.किन्तु स्वदेशी चिकित्सा द्वारा इस पर अंकुश लगाया जा सकता है |

कारण

मधुमेह इन्सुलिन नामक हार्मोन की कमी से होता है | इन्सुलिन द्वारा शरीर में शर्करा की मात्रा नियंत्रित रहती है | जब हम शर्करा और स्टार्चयुक्त भोजन करते हैं, तो हमारा पाचन संस्थान शर्करा और स्टार्च को ग्लूकोज में परिवर्तित कर उसे रक्त में मिलाता है | इन्सुलिन अग्न्याशय में बनता है | इन्सुलिन रक्त के ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलकर मांसपेशियों को शक्ति पहुंचाती है | मधुमेह के रोग में इन्सुलिन का उत्पादन कम मात्रा में होने या न होने के कारण ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में नहीं हो पाता | फलस्वरूप ऊर्जा की पूर्ति के लिए शरीर की वसा तथा प्रोटीन की खपत होने लगती है | इससे शरीर का वजन घटने लगता है | शर्करा मूत्र के द्वारा शरीर से बाहर जाने लगती है | मधुमेह का एक प्रमुख कारण आनुवांशिकता भी है | अधिक आयु के कारण भी अग्न्याशय काम करना बन्द कर देता है | बड़ी आयु में जिन्हें मधुमेह होता है, उनके शरीर का वजन अधिक होने के कारण अग्न्याशय शरीर की आवश्यकता के अनुसार इन्सुलिन का उत्पादन नहीं कर पाता |

लक्षण

मुख्य रूप से मधुमेह दो प्रकार का होता है | एक इन्सुलिन पर निर्भर और दूसरा वह जो इन्सुलिन पर निर्भर नहीं होता है | इन्सुलिन पर निर्भर मधुमेह में इन्सुलिन बनना बिल्कुल बन्द हो जाता है | रोग की उत्पत्ति एकाएक होती है | रोगी कमजोरी अनुभव करता है, उसे प्यास अधिक लगती है, पेशाब अधिक आता है, शरीर का वजन कम होने लगता है | नींद में भी बेचैनी की सी हालत रहती है | यदि इसका तुरन्त इलाज न किया जाए तो रोगी चेतना खोकर मूर्छित भी हो जाता है |

मधुमेह के रोगी अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा कुछ विशेष प्रकार के संक्रमण के भी शिकार हो जाते हैं क्योंकि शर्करा की अधिकता के कारण बैक्टीरिया तथा विषाणु आकर्षित होते हैं | इन रोगियों को फोड़े और ट्यूमर होने की भी संभावना रहती है | मूत्र में शर्करा की अधिक मात्रा होने से शरीर के गुप्तांगों में खुजली होती है | इन रोगियों को यदि कोई चोट लग जाए अथवा कोई घाव हो जाए तो उसे ठीक होने में काफी समय लगता है |

मधुमेह के जिन रोगियों का इन्सुलिन से सम्बन्ध नहीं होता, उनका रोग उग्र नहीं होता | क्योंकि उनका शरीर अल्प-मात्रा में इन्सुलिन बनाता रहता है | यह रोग प्रायः चालीस वर्ष की आयु के बाद अधिक भारी शरीर वाले व्यक्तियों को होता है | प्रारंभ में रोगी प्यास अधिक अनुभव करता है और उसे आवश्यकता से अधिक पेशाब आता है | वह कमजोरी अनुभव करता है | शरीर में सुइयां-सी चुभती अनुभव होती हैं | दृष्टि में भी धुंधलापन आ जाता है | परंतु पूर्छा प्रायः नहीं होती |

उपचार

इन्सुलिन की कमी वाले रोगियों के लिए इन्सुलिन के इन्जेक्शन लेना आवश्यक है | इसके साथ-साथ रोगी को आहार के संबंध में बहुत सावधान रहना चाहिए | आहार नियमित और समय पर लेना चाहिए | यदि इन्सुलिन के इन्जेक्शन के बाद नियमित रूप से भोजन ग्रहण नहीं किया जाए अथवा लापरवाही की जाए तो रक्त में ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाएगी | इससे रोगी को कष्ट होगा | मधुमेह के रोगी स्टार्च और शर्करा के संबंध में भी सावधान रहें | इनकी उन्हें आवश्यकता तो होती है परंतु बहुत अधिक मात्रा में नहीं | इसलिए शर्करा की मात्रा के संबंध में सावधानी बरतना आवश्यक है |

मधुमेह के रोगियों को अपने मूत्र तथा रक्त में शर्करा की मात्रा की जांच के लिए परीक्षण उपकरण अपने पास रखना चाहिए | इससे वे अपने उपचार में और अधिक सतर्क रह सकेंगे |

मधुमेह के जो रोगी इन्सुलिन पर आश्रित नहीं होते, उन्हें नियंत्रित आहार लेना चाहिए ताकि उनके शरीर का वजन अधिक न बढ़े तथा स्टार्च और शर्करा की मात्रा भी नियंत्रित रह सके | रक्त में शर्करा की मात्रा के लिए उन्हें समय-समय पर परीक्षण भी करवाते रहना चाहिए | इन रोगियों को इस प्रकार की औषधियां दी जाती हैं जिससे अग्न्याशय सक्रिय होकर अधिक इन्सुलिन की उत्पत्ति करता है | स्थिति बिगड़ने से बचाने के लिए ऐसे रोगियों को कभी-कभी इन्सुलिन का इन्जेक्शन भी ले लेना चाहिए |

मेथीदाना इस रोग में बहुत ही उपयोगी माना गया है | पांच-छह ग्राम मेथीदाना कूटकर शाम के समय दो-ढाई सौ ग्राम पानी में भिगो दें | प्रातःकाल उठकर इसे खूब अच्छी तरह रगड़-मसलकर पतली छन्नी से छानकर पी लें | डेढ़-दो माह सेवन करने से मधुमेह से छुटकारा मिल जाता है |

कुछ रोग ऐसे होते हैं, जो शरीर में धीरे-धीरे अपना घर बनाते रहते हैं और काफी समय बाद प्रकट होते हैं | ऐसे रोगों को शांत करने के लिए कुछ समय लगता है | मधुमेह ऐसा रोग नहीं है जिसे किसी औषधि की एक खुराक से ठीक किया जा सके | इसलिए मधुमेह के रोगी को बहुत ही सतर्कतापूर्वक अपने भोजन आदि का ध्यान करते हुए उपचार करना चाहिए |

जामुन मधुमेह के रोगी के लिए एक बहुत ही उत्तम परंपरागत दवा है | इसका किसी भी रूप में सेवन कर सकते हैं | इसके उपयोग का सीधा असर अग्न्याशय पर होता है | जामुन का फल, उसके बीज अथवा रस, सभी लाभदायक होते हैं | जामुन की गुठली में इस प्रकार का ग्लूकोज होता है जो स्टार्च को शर्करा में परिवर्तित होने से रोकता है | जामुन की गुठली का चूर्ण बनाकर तीन ग्राम की मात्रा में दिन में तीन अथवा चार बार पानी के साथ सेवन करने से रोगी को लाभ होता है | मूत्र में शर्करा की मात्रा कम होती है | रोगी की शांत न होने वाली प्यास बुझ जाती है |

आयुर्वेद में जामुन के वृक्ष की छाल का भीतरी भाग मधुमेह के उपचार के लिए प्रयोग में आता है | छाल को सुखाकर उसकी भस्म बना ली जाती है | भस्म की 65 मिलीग्राम मात्रा खाने के एक घंटे बाद पानी के साथ लेनी चाहिए |

आम के पेड़ की नरम और हरी कॉपलें भी मधुमेह के रोगी के लिए उपयोगी सिद्ध होती हैं | कोपलों का काढ़ा बनाकर भी प्रयोग में लाया जाता है | रात्रि में इन्हें पानी में भिगोकर रख दें | प्रातःकाल खूब अच्छी तरह मसलकर इसका पानी पी लें | मधुमेह के प्रारंभिक दिनों में इसके उपयोग से मधुमेह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है | आम की पत्तियां छाया में सुखाकर चूर्ण बना लें | प्रातः-सायं एक चम्मच चूर्ण जल के साथ सेवन करने से लाभ होता है |

मधुमेह के रोगियों के लिए करेला विशेष रूप से प्रभावी दवा मानी जाती है | आधुनिक चिकित्सकों ने भी परीक्षणों से इसमें विद्यमान इन्सुलिन के गुण वाले पदार्थों की संभावना का पता लगाया है | इसके उपयोग से रक्त और मूत्र में शर्करा की मात्रा कम होती है | इसलिए मधुमेह के रोगियों को अपने भोजन में करेले का उपयोग अधिक मात्रा में करना चाहिए | करेले के बीजों का चूर्ण भी मधुमेह के रोगी के लिए उपयोगी सिद्ध होता है | मधुमेह के रोगियों को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिल पाते | करेले में आवश्यक विटामिन, खनिज और विशेष रूप से विटामिन-A1, B1, B2, C और लौह तत्व काफी मात्रा में होते हैं | इसके निरंतर उपयोग से मधुमेह के रोगी तनाव से बचे रहते हैं | आंख की तकलीफें नहीं होती | कार्बोहाइड्रेट्स के पाचन में आसानी रहती है | रोगी का शरीर संक्रमणों से बचा रहता है |

मधुमेह के रोगी को दही, फल, हरी साग-सब्जियां, जैसे चौलाई, बथुआ, धनिया, पोदीना, बन्दगोभी, खीरा, ककड़ी, लौकी, करेला, मूली, गाजर, टमाटर, नीबू, प्याज, अदरक और छाछ का प्रयोग करते रहना चाहिए | बादाम भी भिगोकर खा सकते हैं | मधुमेह के रोगी को चीनी अथवा मिठाई आदि खाना बन्द कर देना चाहिए | चावल, स्टार्च, मीठे फल और धूम्रपान आदि से भी बचना चाहिए | अधिक दिमागी काम और बदहजमी से भी बचे | दिन में सोना उचित नहीं है | पानी एक सांस में न पीकर घूट-घूट करके पीएं | मधुमेह के रोगी को चने और जौ के आटे की रोटी काफी मात्रा में हरी सब्जियों के साथ खानी चाहिए | यदि कुछ दिन तक केवल चने की रोटी खाते रहें तो आठ-दस दिन में मूत्र में शर्करा आनी बन्द हो जाती है | जौ को भूनें और आटे की तरह पीसकर रोटी बना लें | इसका सेवन अधिक लाभदायक होता है | मधुमेह के रोगी को प्रातः-सायं तेज चाल के साथ भ्रमण करना भी अत्यावश्यक है | दही और साग-सब्जियों को दो-तीन सप्ताह तक लगातार अधिक मात्रा में खाने से मूत्र शर्करा समाप्त हो जाती है | प्रातःकाल अंकुरित काले चनों के साथ करेले का सेवन मधुमेह के रोगी को बहुत लाभ पहुंचाता है |

चने का पानी पीते रहने से भी मधुमेह का उपचार होता है | टमाटर में कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा बहुत ही कम होती है | इसलिए मधुमेह के जो रोगी अपना वजन कम करना चाहते हैं उन्हें टमाटर का रस प्रयोग करना चाहिए | मधुमेह के रोगी यदि अपने भोजन में सोयाबीन का उपयोग करेंगे तो उन्हें लाभ होगा | सोयाबीन के उपयोग से शरीर को स्टार्च प्राप्त होती है परन्तु मूत्र में शर्करा नहीं बढ़ती | सलाद की पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट्स कम होते हैं | इसलिए मधुमेह के रोगियों को अपने आहार में खुलकर इसका प्रयोग करना चाहिए | मधुमेह काफी भयंकर और सरलता से ठीक न होने वाला रोग है | परन्तु रोगियों को निराश नहीं होना चाहिए | यदि वे ऊपर बताए गए उपचारों के साथ योगासन और उचित व्यायाम करते रहेंगे तो उन्हें अवश्य लाभ होगा और रोग नियन्त्रण में रहेगा |

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