चावल के औषधीय गुण

चावल को कई रोगों के इलाज में प्रयोग में लाया जाता है और कुछ का विवरण नीचे दिया गया है –

  • अतिसार व ज्वर– चावलो की खीलों (लाजा) को पीसकर सत्तू बनायें और आवश्यकतानुसार दूध या शहद, चीनी, जल आदि मिलाकर स्वादिष्ट कर लें। इस ’लाल तर्पण’ कहते है। इसे देशकाल और रोगी की दशानुसार सेवन करने से ज्वर मदात्यय, दाहकता या सीने की जलन, अतिसार आदि में लाभ होता है।
  • आधा सीसी- प्रातः सूर्योदय से पूर्व चावल की खील, 25 ग्राम के लगभग शहद के साथ खाकर सो जाये, ऐसा 2-3 दिन करने से अर्धावमस्तक-शूल (आधा सीसी रोग) दूर हो जायेगा।
  • फोड़े की दाहकता– यदि शरीर के किसी भी अंग पर ऐसा फोड़ा निकला हो जिसमें अग्नि के समान जलन और दाहकता का अनुभव हो रहा हो, तो कच्चे चावलो को पानी में भिगोकर सिल पर पीसकर लेप करना चाहिये। इससे ठण्डक पड़ेगी और रोगी को चैन मिलेगा।
  • भूख न लगना, अग्निमांध– अग्नि पर चावल पकाकर निचे उतारकर 20-25 मिनट के लिये उसमें दूध मिलाकर ढक्कर रख दें। तत्पश्चात् कमजोर और मंदग्नि से पिडि़त युवको को यह पथ्य देना चाहिये।
  • आमाशय या आंत्र का शोथ– जलन (दाहकता) युक्त शोथ अथवा सूजन होने पर चावल की कांजी या चावल का मांड पिलाना लाभदायक रहता है। कांजी बनाने के लिये 1:40 के अनुपात में चावल के आटे में जल मिलाकर तैयार करना चाहिये। स्वाद के लिये दसमें नमक व नींबू का रस भी मिलाया जा सकता है।
  • अतिसार– चावलों का आटा लेई की भाति पकाकर उसमें गाय का दूध मिलाकर रोगी को सेवन करायें।
  • आन्तरिक व्रण– यदि आमाशय का व्रण जठराश्रित आन्तरिक हो तो नमक तथा नीबू का रस नही मिलाना चाहिये।
  • सूजाक, चेचक, मसूरिका, रक्तदोष जन्य ज्वर, जलन व दहकता युक्त मूत्रविकार में नींबू के रस व नमक रहित चावल की कांजी या मांड का सेवन करना हितकर रहता है। यदि पेय बनाने के लिये लाल शालि चावल हो तो अत्युत्तम अन्यथा कोई चावल लिये जा सकते है।
  • चेहरे के धब्बे या झाई पड़ना– सफेद चावलों को शुद्व ताजा पानी में भिगोकर उस पानी से मुख धोते रहने से झाई व चकते साफ हो जाते है और रंग निखर आता है।
  • वीर्य वद्र्वक योग– चावल दाल की खिचड़ी, नमक, मिर्च, हींग, अदरक मसाले व घी डालकर सेवन करते रहने से शरीर में शुद्व वीर्य की आशातीत वृद्धि होती है, पतलापन दूर होता है। यह सुस्वादु खिचड़ी बल बुद्धि वर्द्धक मूत्रक और शौच क्रिया साफ करने वाली होती है।
  • नेत्रों की लाली– सहन करने योग्य गरम भात (उबले चावल) की पोटली बनाकर सेंक करने से वादी एवं कफ के कारण नेत्रों में होने वाली दर्द युक्त लाली समाप्त हो जाती है।
  • मल विकार– चिरवा (चिर मुश या चिड़वा) दुध में भीगोकर चीनी मिलाकर सेवन करने से पतला दस्त (मल भेदन) हो जाता है। किन्तु दही के साथ खाने से मल बंध हो जाता है। अतिसार ठीक हो जाता है। पानी में भली प्रकार धोकर दूध के साथ सेवन करने से चिरवा स्वास्थ्य के लिये हितकर हैै। इसस रंग में निखार आता है और शरीर पुष्ट होता है।
  • गर्भ निरोधक– चावलों के धोवन के साथ साथ धान (चावलों का पेड़) की जड़ पीस छानकर, शहद मिलाकर, पिलाते रहने से गर्भ स्थिति नही हो पाती। यह निदान हानि रहित और सहज है।
  • हृदय की धड़कन– धान की फलियों के पौधो के उपरी भाग को पानी के साथ पीसकर लेपन करने से हृदय कम्पन और अनियमित धड़कन समाप्त हो जाते है।
  • भांग का नशा, मूत्र रेचन, तृषा निवारण– चावल के धोवन में शक्कर और खाने का सोडा मिलाकर रोगी को पिलाने से भंाग का नशा उतर जाता है। पेशाब खुलकर होता है। प्यास शांत करने के लिये इस धोवन में शहद मिला लेना चाहिए।
  • मधुमेह व्रण– चावल के आटे में जल रहित (गाढ़ा) दही मिलाकर पुल्टिस बनाकर लेप कर दें। यह पुल्टिस रोग की दशानुसार दिन में 3-4 बार तक बदलकर बांध देने से शीध्र लाभ होता है।
  • वमन होना- खील (लाजा या लावा) 15 ग्राम में थोड़ी मिश्री और 2-4 नग छोटी इलायची व लौंग के 2 नग डालकर जल मे पकाकर 6-7 उफान ले लें। 1-2 चम्मच थोड़ी देर बाद लेने से वमन होना रूक जाता है। खट्टी पीली या हरी वमन होने पर उसमें नींबू का रस भी मिला लेना चाहिये।
  • शरीर की कान्ति वर्द्धन– चावलों का उबटन बनाकर कुछ दिनों तक नियमित मलते रहने से शरीर कुन्दन के समान दीप्त हो जाता है।
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