सूजाक (Gonorrhea) रोग का प्राकृतिक इलाज

वर्तमान दौर में प्रदूषित हुई संस्कृति तथा पाश्चात्य प्रभाव के कारण अधिकांश नवयुवकों को अनेक प्रकार की यौन व्याधियों का शिकार होना पड़ रहा है। बाजार में बिकनेवाले सस्ते अश्लील साहित्य तथा हमारी फिल्मों ने भी उनके आचार-विचार तथा धारणाओं में बदलाव किया है, जिससे युवाओं में ‘फ्री-सेक्स’ की धारणा बलवती हुई है; और यही मूल रूप से यौन व्याधियों की जननी भी है। आग पर घी डालने का काम किया है झोलाछाप नीम-हकीमों ने, जो इस प्रकार की छोटी-मोटी बीमारी को भी भयंकरता का जामा पहना देते हैं।

कारण

इसे पूयमेह भी कहा जाता है। यह रोग प्रमुखतः रजस्वला स्त्री से संभोग या वेश्यागमन करने, शराब, मांस तथा तेज मसालेदार पदार्थों के सेवन के कारण हो जाता है। सूजाक के रोगी के साथ सहवास करने से यह रोग दूसरे को भी हो जाता है। अत: इसे छूत का रोग माना जाता है। इस रोग के लक्षण शारीरिक क्षमता के अनुसार 10-15 दिन में ही प्रकट होने लगते हैं।

लक्षण

सूजाक होने पर जननेंद्रिय पर सूजन आ जाती है, तेज जलन तथा खुजली होती है, शिश्न मुंड लाल हो जाता है तथा उसे दबाने पर मूत्रमार्ग द्वारा सफेद व गाढ़ा द्रव निकलना प्रारंभ हो जाता है। इस रोग में पेशाब में तेज जलन होती है तथा पेशाब भी रुक-रुककर आता है। रोगी जितनी बार भी पेशाब करता है उतनी ही बार उसे तेज दर्द होता है। रोगी को रात्रि के समय जननेंद्रिय में तेज तनाव महसूस होता है। यह रोग जैसे-जैसे पुराना होता जाता है वैसे-वैसे दर्द व जलन में कमी होती जाती है कितु सफेद गाढ़ा द्रव बढ़ता जाता है। यह रोग ज्यादा पुराना हो जाय तो असाध्य हो जाता है।

उपचार

केलाः दस ग्राम पके केले के फूल सुखाकर उनका महीन चूर्ण बना लें। इसमें 10 ग्राम कलमी शोरा व डेढ़ किलो पानी डाल दें और पानी को किसी मिट्टी के बर्तन में रात्रि के समय भरकर रख दें। दूसरे दिन सुबह इस पानी में डेढ़ किलो दूध मिला लें व रोगी को थोड़ा-थोड़ा करके दिन में कई बार दें। यह उपचार एकसमान क्रम में अपनाने से रोग खत्म हो जाता है। परंतु इलाज के दौरान भोजन में तली और खट्टी चीजों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मद्य इत्यादि का प्रयोग तो भूलकर भी न करें। सादा भोजन खाएं, मांस, मछली व अंडे का सेवन न करें। कच्चे केलों को काटकर धूप में सुखाकर आटा बना लें। इस आटे में शक्कर मिलाकर खाएं तथा ऊपर से दूध की लस्सी पी लें। कुछ दिनों में इस प्रयोग से रोग पूर्णतया समाप्त हो जाएगा।

तरबूजः पके हुए लाल तरबूज का छिलका काटकर उतार दें। अब तरबूज में छह ग्राम कलमी शोरा तथा 50 ग्राम मिश्री डालकर रख दें। रात्रि के समय यह कार्य करें व सुबह इस तरबूज का रस निचोड़कर पीएं सप्ताह भर में रोग दूर हो जाएगा।

खरबूजाः खरबूजे के बीज की एक मुट्ठी गिरियां पीसकर शरबत बना लें। इसी शरबत में दस बूंद चंदन के तेल की मिला दें। रोगी को यह खुराक नियमित पिलाएं। रोग समाप्त हो जाएगा।

खीराः खीरे का रस निकालकर उसमें कलमी शोरा मिलाकर नित्य पीने से रोग मिट जाता है।

बेल: ताजा बेल का गूदा निकालकर दूध में घोल-फेंटकर छान लें। बचा हुआ मोटा-मोटा गूदा भी मसलकर दोबारा छान लें। इसमें एक चुटकी चीनी मिलाकर पी जाएं दो-दो या तीन-तीन घंटे बाद लेते रहें सूजाक में काफी आराम मिलेगा।

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