कुष्ठ (दाग) का घरेलू उपचार

Natural remedies for leucoderma

कुष्ठ एक भयानक बीमारी मानी जाती है। प्रारंभ में यह रोग साधारण सा प्रतीत होता है कितु इसको गंभीरता से नहीं लिया जाए तो यह बड़ा वीभत्स रूप धारण कर लेता है। इस रोग के संबंध में प्राय: यह भ्रांति फैली हुई है कि यह असाध्य रोग है जबकि ऐसा नहीं है। वर्तमान में इसका पूर्णत: इलाज संभव है। साधारणतया यह रोग दो प्रकार का होता है |

गलित कुष्ठ के कारण

परस्पर विरोधी भोजन जैसे दूध के साथ मछली, दही के साथ खरबूजा, शहद के साथ मूली, चावल के साथ सिरका, खीर के साथ कटहल, मांस के साथ पनीर लेने से यह रोग होता है। इसके अलावा छींक, मूत्र, मल, डकार व हिचकी आदि के वेग को रोकने, भोजन के पश्चात व्यायाम करने, खट्टे पदार्थों के अधिक सेवन, डर की अवस्था में शीतल जल पी लेने, धूप में ज्यादा रहने तथा कुसंसर्ग से वायु, पित्त तथा कफ कुपित होकर विकार पैदा करते हैं, जिससे चमड़ी, रक्त तथा मांस दूषित हो जाते हैं व कुष्ठ रोग को उत्पन्न करते हैं।

लक्षण

कुष्ठ रोग की शुरुआत में रोगी को अत्यधिक पसीना आता है। शरीर में चिकनापन बढ़ जाता है तथा बाद में जलन व खुजली के कारण त्वचा सुन्न हो जाती है। शरीर में काले व सफेद चकत्ते पड़कर उनमें सूजन आने लग जाती है। यह सफेद व काले धब्बे धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं तथा सारे शरीर को विकृत कर देते हैं, हाथ-पैर की उंगलियां गलने लगती हैं व गलकर गिर जाती हैं। नाक व तालू भी गलकर फट जाते हैं। शरीर में जगह-जगह पर घाव हो जाते हैं। मांस गलने लग जाता है व रोगी बेहद कुरूप बन जाता है।

सफेद कुष्ठ के कारण

इस रोग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार लग जाए तो बराबर बढ़ता रहता है। हालांकि यह छूत का रोग नहीं है, फिर भी रोगी को सामाजिक रूप से हेय दृष्टि से देखा जाता है। गलित कुष्ठ की भांति यह रोग भी परस्पर विरोधी भोजन करने से ज्यादा फैलता है। धूप में ज्यादा रहने, अधिक खट्टे-मीठे पदार्थों के सेवन, मल-मूत्र, छींक,डकार व उल्टी के वेग को रोकने से या फिर भोजन के तुरंत बाद सहवास करने से यह रोग उत्पन्न होता है। यह रोग वंशानुगत भी पाया जाता है।

लक्षण

इस रोग की शुरुआत में सबसे पहले पसीना आने लगता है तथा धीरे-धीरे शरीर की त्वचा का रंग परिवर्तित हो जाता है, त्वचा में व्यापक जलन, खुजली तथा सुन्नता का अनुभव होने लगता है तथा धीरे-धीरे शरीर में जगह-जगह पर सफेद दाग दिखने लगते हैं, त्वचा की चेतना समाप्त होने लग जाती है। इसके पश्चात यह रोग सारे शरीर को जकड़ लेता है।

उपचार

आंवला: एक चम्मच आंवले के चूर्ण की सुबह-शाम फंकी लेने से लाभ होता है |

अनारः अनार के पत्तों को पीसकर प्रभावित अंग पर लगाने से काफी फायदा होता है।

इलायचीः मैनसिल, इलायची, काली मिर्च, सरसों का तेल तथा आक का दूध मिलाकर पीस लें तथा प्रभावित अंग पर लगाएं, काफी लाभ होगा। त्रिफलाः पटोलपत्र, खैर, नीम, त्रिफला,काला बेत, कुटकी तथा विजयसार को बराबर मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर पिने से रोग काफी हद तक दूर हो जाता है |

अरंडीः अरंडी के पत्ते पीसकर लगाने से आराम मिलता है।

आंवला व कत्थाः कत्थे और आंवले के काढ़े में एक तोला बाकुची के बीजों का चूर्ण डालकर पीने से सफेद कुष्ठ दूर हो जाता है। लोहे का चूर्ण, काले तिल, रसौत, बाकुची व देशी आंवले को भांगरे के रस में पीसकर लगाने से निश्चित रूप से लाभ होता है।

विशेष टिप्पणी

कुष्ठ रोगी को नीम के नीचे बैठकर स्वास्थ्य लाभ लेना चाहिए क्योंकि नीम वातावरण को प्रदूषणमुक्त रखने में काफी सहायक होता है। साथ ही नीम की पत्तियों का रस भी नियमित पीना चाहिए। इसके साथ ही कुष्ठ का पता लगते ही तुलसी की पत्तियों का रस शहद के साथ मिलाकर सेवन करना चाहिए। शुरू में चिकित्सा हो जाए तो रोग बढ़ता नहीं है। इसके पश्चात एक-डेढ़ वर्ष तक | नियमित रूप से गोमूत्र में तुलसी का रस मिलाकर पीना चाहिए तथा परस्पर विरोधी भोजन से परहेज करना चाहिए |

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