शिशु का जन्म और सावधानियां

बड़ी उम्र में प्रायः सबको अपने हिताहित का कुछ न कुछ ध्यान अवश्य रहता है। सभी इस बात की चेष्टा में रहते हैं कि उनको कभी कोई दुख न मिले। परन्तु शिशुओं के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती। उनका सुखदुःख उनके माता-पिता के ऊपर निर्भर रहता है। विशेषकर प्रसव के समय तथा प्रसवान्तर्गत होने वाले रोगों तथा कष्टों का भार उनकी देखभाल करने वालों पर रहता है।

इसलिये शिशु के अभिष्ट होने पर तत्काल या उसके बाद उसकी किस प्रकार परिचर्या तथा पालनपोषण करना चाहिये, यह जानना अत्यन्त आवश्यक है। यह बात भी ध्यान में रखने की है कि शिशु की परिचर्या तथा पालनपोषण सम्यक रूप से होने के लिये शिशु के बासगृह (सूतिका गृह) का शास्रानुकूल होना अत्यन्त आवश्यक है। तभी शिशु प्रसूतकाल सम्बन्धी अनेक रोगों से बच सकता है और जीवन-यात्रा सकुशल समाप्त कर सकता है।

1. शिशु का स्नान

नाभिनाल काटने के बाद ही शिशुओं को स्नान कराना चाहिये। स्नान कराने से पूर्व मृदुगुण वाला कोई तेल जैसे-चन्दनादि तेल, शिशु के सर्वाङ्ग में और विशेषतः बाल, रानों, लिङ्ग के नीचे, ग्रीवा के नीचे तथा अँगुलियों के बीच में, जहाँजहाँ पर अङ्गप्रत्यङ्ग आपस में जुड़े रहते हैं, अच्छी तरह मल देना चाहिये। इसके बाद एक सूखा फलालैन का टुकड़ा लेकर शिशु के सर्वाङ्ग को अच्छी तरह पोंछ देना चाहिये। इस प्रकार शिशु के शरीर में जो एक प्रकार का आटे की लेई के सदृश पदार्थ लेची) चिपका हुआ रहता है, वह साफ हो जाता है और बालों की जड़ के साफ होने से त्वचा का कार्य उचित रूप से होने लगाता है।

त्वचा के मैल को निकालने के लिये पुरानी रीति यह है कि शिशु की नाल काट कर उसके शरीर में बेसन मल कर गरम पानी से स्नान कराया जाता है। फलालैन से शरीर पोंछने के बाद शिशु को गुनगुने जल में साबुन लगाकर स्नान कराना चाहिये। किन्तु साबुन लगाते समय यह ध्यान शिशुचिकित्सा रखना चाहिये कि शिशु के मुख तथा आँखों में साबुन न लगने पायें, क्योंकि इसके लगने से शिशु को बहुत हानि पहुँचती है। इसलिये शिशु का मुँह बिना साबुन लगाए शुद्ध जल से धोना चाहिये। इसी का नाम शिशु का प्रथम स्नान है। यह जितना शीघ्र और होशियारी से कराया जायेगा उतनी ही शिशु की त्वचा साफसुथरी होकर पामा, कच्छ खाज) आदि चर्म रोगों के आक्रमण से बची रहेगी।

2. शरीर का ताप

आजकल शहरों के रहने वाले तथा आधुनिक मनुष्य इसके प्रति जागरूक नहीं रह गये हैं। यही कारण है कि अनेक शिशु सूतिकागार में ही नाना प्रकार की कफसम्बन्धी बीमारियों के शिकार होते दिखाई देते हैंपरीक्षा द्वारा यह निश्चित रूप से स्थिर हो चुका है कि तुरन्त उत्पन्न बालक का शरीरिक ताप गर्मी) बहुत अधिक परिमाण में, यहाँ तक कि कभीकभी स्वाभाविक ताप की अपेक्षा 25 डिग्री कम हो जाता है। इसका कारण जान सकना कुछ कठिन नहीं है।

शिशु माता के गर्भ में जिस जरायुकोष मध्यस्थ तरल पदार्थ के अन्दर रहता है उसकी गर्मी 99 डिग्री होती है, और बाहरी हवा का ताप उसकी अपेक्षा कम होता है। इसलिये उत्पन्न होते ही शिशु का संस्पर्श अपेक्षाकृत अल्प ताप के वातावरण से होता है और इससे उसके शरीर की गर्मी एकाएक कम पड़ जाती है। जन्म के समय शिशु के शरीर के ताप की रक्षा अत्यन्त आवश्यक है।

3. नवजात शिशु का जल स्नान

नवजात शिशु को आरम्भ में प्रतिदिन एक बार स्नान आवश्य कराना चाहिये। पहले स्नान के जल की गर्मी तत्काल दूहे हुये दूध के बराबर होनी चाहिये। इसके बाद धीरे-धीरे जल की गर्मी के परिमाण में कमी करते जाना चाहिये। कुछ सप्ताह के बाद शीतलसे शिशु को स्नान कराना उचित है।

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