पुरूषों के गुप्त रोग और गलत आदतों की शुरुआत

जिस आनन्द की आदत युवा अथवा बाल्यावस्था की भूल से हो जाती है उसके फलस्वरूप वे गुप्त रोगों से ग्रस्त हो जातें हैं | अधिकाँश गुप्त रोगों के शुरूवात 14 से 18 वर्ष की उम्र में हो जाता है | दुराचारी जनों के सम्पर्क में, जो लोग अश्लील बातों को करके, सम्भोग के आनन्द का सविस्तार वर्णन रोचक शब्दों में करतें है, निकट बैठाकर भोले भाले बच्चों को इस आनन्द की अनुभूति कराते है |

इसके आलावा और कई अश्लील कार्यो को अंजाम देकर बच्चो की आदत को खराब किया जाता है जिसका वर्णन यहाँ करना उचित नहीं है | इसी तरह के आनन्द के वशीभूत होकर बच्चों में दुष्कर्म की आदत पड़ जाती है | वह बालक स्वयं इन बुरे कर्मो में अभ्यस्त हो अपने हाथ से ही वीर्यपात करने लगते है और वास्तवित यौन सुख से वन्चित रह जाते है | उनकी शिक्षा तक बंद हो जाती है, निश्तेज हो जाते है, दिमाक कमजोर हो जाता है, धातुक्षय हो जाता है, पाचन क्रिया भी खराब हो जाती है, नेत्र की ज्योति क्षीण हो जाती है, चक्कर आने लगते है | रोगी बालक शर्म के मारे किसी को कुछ भी बताने में शर्माते है |

विवाह होने पर वह पुरुष स्त्री से मैथुन भी नहीं कर पाता है | लिंग में साधारण उत्तेजना होती भी है तो स्त्री के योनि में डालते ही पानी जैसा क्ष्राव हो जाता है और व हताश होकर अपने लिंग को बाहर निकाल लेता है | इसके बाद वह इस सम्बन्ध में काफी प्रयास करता है किन्तु वह न तो खुद यौन सुख का आनन्द पाता है और न ही अपनी पत्नी को सुख दे पाता है |

कभी – कभी लोग शर्म के मारे आत्महत्या तक कर लेते है | ऐसे रोगियों के पाचन संस्थान. मष्तिष्क, वीर्यवाहक नलियां, श्वशन नलिया आदि सभी दोषपूर्ण हो जाती है | लेकिन ऐसे रोगों से शिकार लोगों को घबराना नहीं चाहिए क्योकि हर किसी रोग का कोई न कोई इलाज जरूर होता है| यहां पर हम भी घरेलू नुक्से बताएंगे जिसको प्रयोग करने के बाद काफी हद तक रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है | लेकिन समस्या यदि बढ़ गयी है और घरेलू इलाज से कोई फ़ायदा न हो रहा हो तो किसी गुप्त रोग विशेषज्ञ से जरूर सम्पर्क करे (शरमाये ज़रा भी नहीं) |

हम इस वेबसाईट की अगली आर्टिकिल (पोस्ट) पर निम्न रोगों के बारे में बताएंगे और इनके  घरेलू इलाज के बारे में भी बतायेगे –

  1. स्वप्न दोष (नींद में वीर्यपात होना)

  2. शुक्रमेह ( मूत्र के पूर्व या पश्चात वीर्यपात होना)
  3. वीर्य का पतला होना
  4. शीघ्रपतन (सम्भोग से पूर्व या अल्पकाल में वीर्य का श्राव)
  5. लिंग का पतला और छोटा होना
  6. नपुंसकता (नामर्दी) – लिंग में उत्तेजना न आना

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