वर्षा ऋतु में आहार विहार Varsha Ritu Me Aahar Vihar

मनुष्य को स्वस्थ व निरोगी रहने के लिए प्रत्येक ऋतु के अनुसार आहार-विहार करना चाहिए. ऋतु के विपरीत किया गया आहार विहार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है. ऋतु के प्रभाव के अनुसार आहार-विहार के नियमों का पालन करने से स्वस्थ शरीर और मन के लिए लाभदायक होता है(Varsha Ritu Me Aahar ke Niyam Tatha Unka Palan).

प्रकृति के अपने कुछ नियम होते हैं जिनके विरुद्ध जाना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होता है. ऐसे ही वर्षा ऋतु के भी अपने नियम हैं. ग्रीष्म ऋतु के बाद आने वाली सावन की फुहार मन को प्रफुल्लित कर देती है. पर इस मनमोहक मौसम में अगर आहार विहार पर ध्यान न दिया जाए तो हम कई बीमारियों से ग्रस्त हो सकते हैं. अतः आवश्यक है कि वर्षा ऋतु में नियमित और संयमित आहार विहार का विशेष रुप से ख्याल रखा जाए( Varsha Ritu Me Bimariyo Ke Failane Ka Bhi Dar Rahta Hai).

वर्षा ऋतु का आगमन Varsha Ritu Ka Aagman

गर्मियों के बाद आने वाली वर्षा की फुहारें हर किसी का मन मोह लेती हैं. प्रकृति का अंग अंग मानो वर्षा की फुहारों के आते ही नृत्य करने लगती है. इस ऋतु में प्रकृति की दर्शनीय सुंदरता का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. पूरी धरती पर हरियाली छा जाती है, नदियां, नालें और तालाब जल से भर जाते हैं. अथार्त यह कहना उचित है कि वर्षा ऋतु में समस्त पृथ्वी एक नई उमंग से भर उठती है. किंतु यह ऋतु अनेक बीमारियों को साथ लेकर आती है. इन बीमारी से बचाव का एकमात्र उपाय है ऋतु के अनुसार आहार-विहार के नियमों का पालन करना. जो व्यक्ति मौसमानुसार आहार-विहार में परिवर्तन करता है वह सदैव स्वस्थ रहता है.

वर्षा ऋतु वैसे तो चार माह की एक ऋतु है,(Varsha Ritu Ke Fayde Aur Nukshan) लेकिन हम इसके दो भाग कर सकते हैं पहला प्रारंभिक काल और दूसरा अंतिम काल. दोनों काल खंडों की स्थिति में अंतर होता है. इसलिए एक ही ऋतु होते हुए भी इसके दो भाग करना आवश्यक और उपयोगी है.

वर्षा ऋतु के आरम्भ में आहार विहार Varsha Ritu Ke Aarambh me Aahar Vihar

वर्षा ऋतु का प्रारंभिक काल पहले दो माह का होता है- श्रावण मास और भाद्रपद. इस काल में वातावरण में नमी और आर्द्रता बढ़ने के साथ हमारे शरीर की जठराग्रि कमजोर होने लगती है और हमारी पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है जिससे त्रिदोष अर्थात् वात, पित तथा कफ का संतुलन बिगड़ जाता है. पाचन ठीक प्रकार से नहीं होने के फलस्वरुप अनेक बीमारियां जैसे अजीर्ण,  पेट के रोगम, कब्ज, अतिसार, ज्वर आदि होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है(Varsha Ritu Me Pet Sambandhi Samasye).

इन रोग से बचने का प्रबल उपाय यही है कि वर्षा ऋतु में साधारणतः सादा हल्का और सुपाच्य आहार ग्रहण किया जाए. आयुर्वेद के अनुसार उपवास और लघु भोजन भी हितकारी है.

आहार में क्या शामिल करना चाहिए Aahar Me Kya Shamil Karna Chahiye

अपने भोजन में हरी सब्जियों, फल, तरल पदार्थों को सम्मिलित करें. मांसाहार, तले मसालेदार व गरिष्ठ भोजन के सेवन से परहेज करें. वर्षा ऋतु में घी का सेवन कम मात्रा में करना चाहिए एवं दूध, दही, छाछ, दलिया, गेहूं की रोटी, चावल का उपयोग लाभकारी होता है. इस ऋतु में जल की स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान देना चाहिए. दूषित पानी पीने से जनित रोगों से बचाव के लिए हमेशा पानी उबालकर पिएं. सदा शुद्ध जल का ही प्रयोग करें, गंदे पानी के सेवन से उदर व त्वचा संबंधी व्याधियां हो सकती हैं. रोड साइड मिल रहे चटपटे खाद्य पदार्थों के सेवन से परहेज करें(Aahar Sambhandhi Parhej Kre)

वर्षा ऋतु में दिनचर्या Varsha Ritu Me Dinacharya

वातावरण में नमी के कारण पानी जल्दी नहीं सूखता, उमस से अधिक पसीना आता है. इन कारणों से कई त्वचा संबंधी रोग जैसे एग्जिमा, खाज खुजली, फंगल संक्रमण आदि का खतरा बढ़ जाता है. त्वचा पर टैल्कम पाउडर लगाकर रखें, यह अतिरिक्त नमी को सोख लेता है. साथ ही स्वच्छ, हल्के और सूखे वस्त्र धारण करें.

वर्षा ऋतु में अति व्यायाम, दिन में सोना, रात्रि जागरण, बारिश में अधिक भीगना, धूप में बैठना उचित नहीं है. खाने पीने की सभी वस्तुओं को मक्खियों एवं कीटाणुओं से बचाए रखे व उन्हें साफ करके ही प्रयोग में लें(Varsha Ritu Me Viral Infection)

कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करते रहे, आसपास जमा पानी में घासलेट या पेट्रोल डाल दें, घर की खिड़की के पास में तुलसी का पौधा लगाएं, इससे मच्छर नहीं पनपते. इसके अतिरिक्त रात को सोते समय मच्छरदानी लगाएं या मॉस्क्यूटो रिपैलेंट क्रीम का प्रयोग करें.

वर्षा ऋतु के अन्त में आहार-विहार Varsha Ritu Ke Ant me Aahar-Vihar

वर्षा ऋतु का अंतिम काल अश्विन और कार्तिक माह में होता है. वर्षा के अंतिम काल में सूर्य की हल्की हल्की किरणों और बारिश की फुहारों के साथ से धरती की आभा देखते ही बनती है. इस काल में मौसम अत्यंत सुहाना और शांतिदायक हो जाता है.

हर स्थान पर सूर्य की किरणों सही प्रकार से न पहुंच पानी के कारण मच्छर व अन्य कीटाणु पनपने लगते हैं. इस समय वात पित्त दोष के बढ़ने का खतरा रहता है. इससे बचने के लिए वात और पित्त कुपित करने वाले भोजन जैसे गरिष्ठ, चटपटे व्यंजनों के सेवन से परहेज रखे.

वर्षा ऋतु में आहार सम्बन्धी सावधानियां

रात्रि को देर से भोजन न करें. हरी पत्तेदार सब्जियों पर मच्छरों ज्यादा तड़पते हैं इसलिए इनके सेवन से परहेज करें. पानी का उपाय का सेवन करें. इस काल में मौसमी फल जैसे आम, जामुन आदि का सेवन सर्वोत्तम माना गया है. मक्का के भुट्टों का भी सेवन करना चाहिए. इसे खाने के बाद दही या छाछ का सेवन अवश्य करें. घर एवं आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखें और झाड़ियों न उगने दे. वर्षा ऋतु में रोगों से बचाव के लिए बड़ी हरड़ और सेंधा नमक का चूर्ण प्रयोग करें. प्रातः 1-2 चम्मच चूर्ण को ठंडे पानी के साथ सेवन करें(Varsha Ritu Me Machhar Sambandhi savdhaniya).

वर्षा ऋतु में उचित आहार विहार के नियमों का पालन कर स्वास्थ्य रक्षा की जाती है. स्वस्थ शरीर में प्रसन्न मन निवास करता है. स्वास्थ्य की रक्षा कर आप वर्षा ऋतु के मनोहारी दृश्यों और प्रकृति के अनुपम सौंदर्य का निरवरोध लाभ उठा सकेंगे.

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