प्रेगनेंसी के दौरान आप क्या करें Beautiful Healthy Baby Tips During Pregnancy In Hindi

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घर में नन्हा मेहमान आने वाला है, यह खबर परिवार के हर सदस्य को खुश कर देती है | लेकिन इस ख़ुशी के बीच माँ और बच्चे की सेहत को भी सुनिश्चित करने का उपाय करें | प्रेग्नेंसी के दौरान माँ और डिलिवरी के बाद बच्चे को किसी तरह कि परेशानी न हो, तो इसके लिए जरुरी है कि समय-समय पर दोक्टारी सलाह और कुछ ज़रूरी टेस्ट

हर मां की पहली प्राथमिकता होती है कि होने वाला उसका बच्चा स्वस्थ्य और रोगमुक्त हो। वैसे भी विज्ञान और तकनीक ने आज इतनी प्रगति कर ली है कि उसकी मदद से होने वाले बच्चे का बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित हो सकता है। प्रेग्नेंसी के दौरान आपको और डिलिवरी के बाद आपके बच्चे को किसी तरह की परेशानी न हो, इसके लिए एक्सपर्ट द्वारा तमाम तरह के उपाय किए जा रहे हैं। लेकिन इसका लाभ बहुत कम लोगों को ही मिल पा रहा है। यूनाइटेड नेशंस की 2013 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रसूति मृत्यु दर सर्वाधिक (17 प्रतिशत) भारत में है। 2.89 लाख महिलाओं में 50 हजार प्रसूति मृत्यु होती है। दूसरे नबर पर नाइजीरिया आता है |

रिसर्च के अनुसार, प्रसूति मृत्यु का प्रमुख कारण कम उम्र में शादी तथा प्रसव पूर्व गर्भधारण के बारे में अज्ञानता पाई गई। प्रसव के बाद रक्तस्त्राव भी मृत्यु का प्रमुख कारण पाया गया। स्पष्ट है आम लोगों में प्रेग्नेंसी को लेकर आज भी जानकारी का अभाव है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। ऐसे में जरूरी है मां और बच्चे की सेहत के लिए समय-समय पर डॉक्टरी जांच और कुछ जरूरी टेस्ट।

अगर आप भी अपने घर में नन्हे मेहमान के स्वागत की तैयारी कर रही हैं, तो गर्भधारण करने से पहले अपने डॉक्टर से जांच अवश्य करवा लेनी चाहिए, ताकि आप इसके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो जाएं। जांच करवाते समय अपने डॉक्टर से कुछ भी न छुपाएं और अगर आपको कोई बीमारी है, तो उसके बारे में डॉक्टर से बात जरूर करें। प्रेग्नेंसी से पहले स्वास्थ्य संबंधी सभी समस्याओं को लेकर डॉक्टर से बात करें।

प्री-प्रेग्नेंसी काउंसलिंग

इस काउंसलिंग का मुख्य उद्देश्य यह है कि आप गर्भधारण के लिए सभी डॉक्टरी पैमाने पर फिट हैं या नहीं। अगर आपको पहले से ही हाइपरटेंशन, थॉयराइड या फिर अन्य शारीरिक समस्या है, तो सुरक्षित प्रेग्नेंसी के लिए जरूरी है डॉक्टरी सलाह। साथ ही अगर परिवार में कोई जेनेटिक बीमारी है, तो भी आपको डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए। यदि डायबिटीज है, तो उसे नियंत्रित करना जरूरी है, अन्यथा दिल में छेद अथवा अविकसित अंग वाले शिशु का जन्म हो सकता है।

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थॉयराइड की जांच भी जरूरी है, अन्यथा गर्भपात की समस्या हो सकती है। यही नहीं गर्भधारण की योजना बनाने से तीन महीने पहले से ही फॉलिक एसिड लेना चाहिए, क्योंकि हीमोग्लोबिन 10 QM होना चाहिए। यानी इस दौरान जो जांच जरूरी है, वे हैं- पैप स्मिअर टेस्ट, क्लीनिकल ब्रेस्ट एग्जामिनेशन, हिमोग्लोबिन, थैलेसीमिया, शुगर आदि।

इसकी जांच के लिए ब्लड टेस्ट करवाएं। आर.एच. फैक्टर की भी जांच शुरू में ही करानी चाहिए। आर.एच. फैक्टर यदि निगेटिव है, तो पहला बच्चा तो नॉर्मल होगा, लेकिन दूसरे बच्चे के समय स्पेशल जांच की जाती है। बच्चा होने के बाद जांच की जाती है, यदि पिता आर.एच. पॉजिटिव है तथा मां (-) है, तो इंजेक्शन नहीं दिया जाता है। यदि बच्चा आर.एच. (+) है, तो 72 घंटे के अंदर मां को एक इंजेक्शन (एंटी डी) फ्री लगाया जाता है | इससे दूसरे बच्चे के लिए ठीक रहता है |

आरएच फैक्टर की जाँच क्यों है जरुरी

आरएच फैक्टर हर लाल रक्त कणीकाओं पर एक प्रोटीन होता है | अगर आप में आरएच फैक्टर है, तो आप आरएच पाजिटिव हैं | अगर नही है तो आरएच निगेटिव हैं | वैसे आरएच फैक्टर आपके स्वस्थ्य को प्रबावित नही करता है, लेकिन माँ और बच्चे का आरएच फैक्टर अलग-अलग होगा, तो यह गर्भावस्था के दौरान माँ और बच्चा दोनों के लिए ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा कर सकता है और घातक भी हो सकता है | ऐसे में डॉक्टर कि सलाह जरुरी है | आरएच फैक्टर अगर पुरुष का पाजिटिव है और महिला का निगेटिव, तो होने वाले बच्चे में अनेक विकृतियां होने कि आशंका होती है |

जब कर लें कंसीव

प्रेग्नेंसी के दौरान संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक खाना खाएं | अगर आपको मार्निंग सिकनेस कि समस्या रहती है, तो सुबहा खाली पेट ज्यादा देर तक ना रहें |

मां बनने वाली हैं, यह जानने के बाद गर्भवती महिला को 12-14 हफ्ते के बाद डॉक्टर की सलाह पर कैल्शियम, आयरन तथा खाने में हाई प्रोटीन वाली खुराक लेनी चाहिए। प्रेग्नेंसी के दौरान ली जाने वाली फॉलिक एसिड का टैबलेट, बच्चे में किसी तरह के बर्थ डिफेक्ट्स को रोकने में मददगार होता है। इसलिए आहार में मिल्क प्रोडक्ट, हरी सब्जियां आदि शामिल करें। गुड़, मेथी, काला चना आयरन से भरपूर होते हैं, अतः इनका सेवन करना चाहिए।

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इन दिनों हार्मोन्स में आए बदलाव के कारण अधिकांश महिलाओं को कब्ज की शिकायत रहती है। जिसके कारण शरीर की पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती। इसके लिए आपको रोजाना फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ जैसे फल एवं सब्जियों व दालों का ज्यादा से ज्यादा सेवन करना चाहिए। कैफीन युक्त पेय पदार्थ न लें, क्योंकि कैफीन आपके बॉडी से नियमित रूप से मल त्यागने के लिए आवश्यक द्रवों को नष्ट कर देता है।

डाक्टर से पहली मुलाकात से अपेक्षाएं

आपको प्रसव पूर्व परामर्श से क्या अपेक्षाएं होनी चाहिएं?

आपकी प्रथम विजिट सबसे लम्बी होगी, इसके दौरानः

  1. आपकी ऊँचाई, वजन तथा रक्तचाप (ब्लड प्रेशर) की जाँच की जायेगी।
  2. आपका रक्त लिया जायेगा जिससे विभिन्न रोगों के लिए तथा लौह स्तरों की कमी सम्बन्धी जांच की जाएगी। आपसे पूछा जायेगा कि क्या आप एचआईवी परीक्षण कराना चाहेंगी।
  3. आपको संक्रमण, शर्करा तथा प्रोटीन संबंधी जाँच के लिए अपने मूत्र का नमूना देना होगा।
  4. आपको संभावित तिथि बतायी जायेगी, यह अंदाजा कि किस दिन आप के बच्चे के जन्म की संभावना है।
  5. आपसे आपके , आपके साथी के, परिवार के सदस्यों के तथा उन दवाओं एवं जड़ी बूटियों के सम्बंध में, जो आप ले रही हैं, प्रश्न पूछे जांयेगें |
  6. आपका चिकित्सक षारीरिक परीक्षण करेगा जिसमें श्रोणिय (पेल्विक) परीक्षण तथा पेप स्मीयर शामिल होंगे।
  7. चिकित्सक आपको फालिक एसिड के साथ प्रसव पूर्व विटामिन लेना प्रारम्भ करने की सलाह देगा।
  8. अपनी अगली मुलाकात (विजिट) के लिए तिथि निश्चित करा लें।

सभी प्रसव पूर्व मुलाकातों के समय

  • आपके रक्तचाप, वजन, मूत्र तथा सामान्य स्वास्थ्य की जांच की जायेगी।
  • आपके बच्चे की हृदय गति तथा विकास संबंधी जांच होगी।
  • अन्य परीक्षण जैसे रक्त की जांच तथा अल्ट्रासाउण्ड किए जा सकते हैं।
  • यदि आपके मन में स्वयं के अथवा अपने बच्चे के विशय में कोई प्रष्न अथवा चिंता हो तो सवाल पूछें अथवा चर्चा करें।

प्रेग्नेंसी के दौरान टेस्ट Test During Pregnancy (glucose, genetic, DNA)

प्रेग्नेंसी के दौरान मुख्य रूप से आपका वजन, ब्लड प्रेशर, एनीमिया की जांच के लिए टेस्ट, पैरों में सूजन की जांच की जाती है। इस दौरान मुख्य रूप से दो प्रकार के टेस्ट करवाये जाते हैं, पहला रूटीन चेकअप और दूसरा प्रेग्नेंसी के दौरान किसी खास तरह की समस्या की जांच के लिए किया जाने वाला टेस्ट। प्रेग्नेंसी के दौरान पहले छह माह तक हर महीने डॉक्टरी जांच की सलाह दी जाती है।

इसमें रुटीन टेस्ट गर्भधारण करने के दूसरे माह में यानी लगभग छह सप्ताह की प्रेग्नेंसी के दौरान किया जाता है। इस टेस्ट में ब्लड काउंट, यूरिन एनालिसिस, ब्लड शुगर टेस्ट, थॉयराइड टेस्ट, थैलेसीमिया टेस्ट, एचआईवी, हेपेटाइटिस बी आदि की जांच के लिए टेस्ट शामिल हैं। प्रेग्नेंसी में डॉक्टर आपको कम-से-कम टीटी (टिटनेस) की दो खुराक लेने की सलाह देंगे। पहला टीका प्रेग्नेंसी के प्रथम तिमाही या पांचवें महीने में दी जाती है और सेकंड डोज सातवें महीने में दी जाती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि दूसरा टीका डिलिवरी की संभावित तारीख से चार सप्ताह पहले दिया जाना चाहिए।

इसके अलावा इस समय अल्ट्रासाउंड किया जाता है, जिस बच्चे के दिल की धड़कन की जांच के अलावा, मल्टी प्रेग्नेंसी के साथ-साथ असामान्य प्रेग्नेंसी की भी जांच की जाती है। अगला अल्ट्रासाउंड 11वें-14वें हफ्ते में किया जाता है। इस अल्ट्रासाउंड से बच्चे के विकास का पता चल जाता है और साथ ही इससे यह जानने की कोशिश की जाती है कि कहीं बच्चे को किसी प्रकार की जेनेटिक समस्या तो नहीं है।

इस प्रकार अल्ट्रासाउंड पहले 11-13 हफ्ते, फिर 18-20 हफ्ते में तथा पुनः बच्चे की ग्रोथ देखने के लिए 28वें हफ्ते में किया जाता है। यदि बच्चे का विकास नहीं हो रहा हो, तो हर चार हफ्ते में अल्ट्रासाउंड किया जाता है।

32वें सप्ताह यानी आठवें माह में एक खास तरह का अल्ट्रासाउंड किया जाता है, जिसमें बच्चे के दिल की जांच और उसके मस्तिष्क व नाभि आदि में खून के संचार की जांच की जाती है। नौवें माह में फिर से बच्चे के ग्रोथ को जांचने के लिए ब्लड टेस्ट और यूरिन टेस्ट किया जाता है।

इस तरह आप सेहत के प्रति जागरूक रहकर प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली अन्य परेशानियों को कम कर सकती हैं।

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