भयंकर बीमारी में उपवास से कैसे पायें राहत Fasting For Treatment of Incurable Diseases

भयंकर बीमारी में उपवास से कैसे पायें राहत Fasting For Treatment of Incurable Diseases

भयंकर बीमारी में उपवास से कैसे पायें राहत Fasting For Treatment of Incurable Diseases – आइये इस लेख की शुरुवात छोटी सी कहानी से करते हैं जिसे मैंने कही पढ़ा था –

एक महिला ने एक डाक्टर को फोन किया और कहा ” मेरी बेटी मर रही है!”

तो डाक्टर ने पूछा ”आपको कैसे पता चला कि बच्ची मर रही है?”

बच्ची की माँ ने घबराए हुए स्वर में कहा, ”उसे न्यूमोनिया हो गया है और डाक्टरों ने कहा है कि आपकी बच्ची नहीं बचेगी ”

तो इस बात पर डाक्टर ने उस महिला को कहा कि आइए हम आपकी बच्ची को जिलाने का प्रयास करते हैं ।

फोन पर ही डाक्टर ने सलाह दी बच्ची के बिस्तर के पास से दवा की बोतलें हटा लीजिए, खिड़की से ताजा हवा कमरे में आने दीजिए, बच्ची को गर्म रखिए, किन्तु ताजा हवा को न रोकिए और बच्ची को इच्छानुसार पीने के लिए पानी दीजिए; किन्तु उसे किसी भी प्रकार का आहार या दवा मत दीजिए ।

इस प्रकार 3-4 दिनों में ही बच्ची ठीक होने लगी फिर धीरे – धीरे आहार देना शुरू कर दिया गया | 20 दिनों के अन्दर ही वह एकदम स्वस्थ हो गयी |

यह कोई असामान्य उदाहरण नहीं है । ऐसे तो हजारों रोगियों को उपवास के द्वारा बचाया गया है जिन्हें डॉक्टरों ने असाध्य कहकर त्याग दिया था । ऐसे रोगियों बचाने के लिए डॉक्टर जिन दवाओं का उपयोग करते है, वे दवाएँ ही प्राय: मृत्यु का कारण बनती हैं । न्यूमोनिया में रोगी को कफ सुखानेवाली दवाएं दी जाती हैं । सीने के रोगियों को दर्दनिवारक लेप किया जाता है । किंतु रोग कम नहीं होता । इन्हीं दवाओं के कारण रोगियों को मृत्यु की शरण जाना पड़ता है । न्यूमोनिया में आहार देने से अधिक हानि होने का भय रहता है । जब न्यूमोनिया जैसी बीमारी में रोगी को आहार दिया जाता है तब शरीर के विषैले तत्त्व अधिक मात्रा में सूख जाते है । आहार देते रहने से विघटन की क्रिया रुक जाती है और फेफड़ों में सूजन आ जाती है । यह सूजन जल्दी नहीं मिटती । अंत में पककर वहाँ घाव जाता है |

बुखार और जलन जैसे तीव्र रोगों में भूख मर जाती है । शरीर के भीतर पाचनतंत्र की दीवारों में से अधिक मात्रा में इंद्रियों का मल, कफ आदि बाहर निकलता है । Gastritis और Typhoid जैसे रोगों में ठंड के कारण नाक और गले से कचरा निकलता रहता है तथा पाचनतंत्र की स्वाभाविक स्नायु संबंधी क्रियाएँ रुक जाती हैं । आहार पचाने की शक्ति खत्म हो जाती है । जलन, वेदना और ज्वर के कारण मल – मूत्र का विसर्जन करने वाले तंत्र और उदर से संलग्न संचालन क्रिया मंद और गतिहीन हो जाती है ।

ऐसे रोगियों को आहार देने से उनकी दर्द और परेशानियों में वृद्धि होती है । उनके शरीर की गर्मी बढ़ जाती है । पाचनतंत्र बिगड़ जाता है । हाथ – पैर की शक्ति घट जाती है और स्वस्थ होने की संभावना कम हो जाती है । हाथ और पैर को आराम की जरूरत होती है । ऐसे आहार का सेवन करने से क्या लाभ, जिसे पचाया न जा सके? रुचि न होने पर भी आहार ग्रहण करने से बेचैनी, तकलीफ और उल्टी होती है । रोगी को जबरदस्ती आहार देने से लाभ नहीं, अपितु हानि होती है । इसलिए रोग में उपवास ही उचित है ।

रोगी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का आहार स्वादिष्ट नहीं लगता । जरा – सा भी शोरगुल अच्छा नहीं लगता । उसका मस्तिष्क चकराया करता है । नई बीमारी का प्रथम लक्षण होता है भोजन के प्रति अरुचि । चेचक, टाइफोइड, ज्वर, न्यूमोनिया, डिप्थीरिया, कालरा, खसरा आदि रोगों में सबसे पहले भूख मर जाती है । जब प्रकृति बुद्धिपूर्वक आहार लेने की सभी इच्छाओं का नाश करती है, तब हमें आहार लेने की कोई आवश्यकता नहीं है । ऐसी तकलीफों से बचने का एकमात्र उपाय उपवास ही है ।

उपवास कुछ समय के लिए उत्तम उपाय या साधन है । उपवास द्वारा शरीर अपने विशेष आवश्यक काम करा लेता है । उपवास द्वारा जीवित अंग- प्रत्यंग बड़े- बड़े खतरों का सामना करके जीवन को बचाने के लिए शक्तिशाली बनता है । यह सच है कि उपवास और उपचार दोनों का ही बीमारियों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण स्थान है । उपवास एक प्रकृतिप्रदत्त सहज साधन है, जो बीमारी और स्वस्थ अवस्था इन दोनों स्थितियों में सर्वाधिक उपयोगी है, किन्तु उपवास और स्वास्थ्य – रक्षा के अन्य उपायों का समन्वय शरीर के यंत्रों को स्वस्थ और सशक्त बनाता है ।

उपवास उपचार नहीं है, फिर भी चिकित्सा प्रक्रिया का एक आवश्यक और अभिन्न अंग है । जिस समय पाचनतंत्र रुक जाता है, आहार लेने की इच्छा नष्ट हो जाती है, उस समय यह उत्तम साधन रोगनिवारक और आरोग्यरक्षक प्रक्रिया की विभिन्न पद्धतियों का एक भाग बन जाता है, जो रोगी को बिस्तर पर आराम लेने के लिए विवश करता है ।

रोग – निवारण के लिए आधुनिक सर्जरी भी पूर्णत: सफल नहीं होती । उसका विकास व्यावसायिक दृष्टि से हो रहा है; किन्तु मानवीय दृष्टिकोण का पतन हो रहा है । उसके कुछ आवश्यक और कुशल प्रयोगों को ही उपचार का एक भाग माना जा सकता है । अधिकांश प्रयोग अनावश्यक हैं । बड़े – बड़े सर्जन भी इस बात को स्वीकार करते हैं । वे दिन दूर नहीं हैं जब भविष्य में उपवास द्वारा सर्जरी की अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाएगी ।

उपवास केवल रोगियों के लिए ही है ऐसा नहीं सोचना चाहिए । सामान्य शारीरिक तकलीफों के लिए भी अल्पकालीन उपवास लाभ पहुँचाता है । उपवास द्वारा हम भयंकर रोगों का प्रारंभ में ही नाश कर सकते हैं और उनकी जड़ें शरीर में जम नहीं पातीं । सिर – दर्द, पेट का दर्द या सामान्य अशक्ति में कुछ दिनों का उपवास लाभप्रद होता है । उससे शरीर का विकृत कचरा बाहर निकल जाता है और भविष्य में कोई बड़ी बीमारी नहीं होती ।

इसके बावजूद यह समझ लेना चाहिए कि उपवास कोई उपचार नहीं है । उपवास से शरीर को आराम मिलता है, अंगों को बल मिलता है । परिणामस्वरूप आरोग्यप्रद प्राकृतिक शक्तियाँ रोगमुक्ति के लिए तेजी से प्रयत्न करती हैं ।

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