पित्ताशय की पथरी का नेचुरोपैथी से इलाज Gall Bladder Stone Treatment Without Surgery

gall bladder stones in hindi

पित्ताशय की पथरी का नेचुरोपैथी से इलाज Gall Bladder Stone Treatment Without Surgery In Hindi – पित्ताशय और यकृत की नली में होनेवाली पथरी को ‘कोलेलीथियासिस’ कहते है । पित्त का मुख्य तत्त्व कोलेस्टरीन थोड़ा या सबका सब गाढ़े मल के साथ मिलकर दानेदार पथरी में परिवर्तित होता है ।

पित्ताशय की पथरी के लक्षण Symptoms of Gall Bladder Stone

जब यह पथरी सरकती है तब रोगी को बहुत कष्ट होता है । कभी-कभी तो यह इतनी छोटी होती है कि रोगी को उसकी जानकारी ही नहीं हो पाती । यदि यह पथरी यथावत् पड़ी रहती है तो रोगी को कोई तकलीफ नहीं होती । वर्षों तक वह जिंदा रहता है । अन्य बीमारी से वह मरता है, किसी को यह मालूम ही नहीं हो पाता कि उसके अंदर कितनी पथरी थी । मरने के बाद के परीक्षणों में रोगी के शरीर में यह पथरी मालूम होती है, किंतु रोगी को जीवनभर उसके अस्तित्व के विषय में किसी भी प्रकार की शंका नहीं होती ।

स्वास्थ्य गिरने से शरीर की कुछ विशिष्ट क्रियाओं के कारण गुर्दों, यकृत और पित्ताशय की थैली में पथरी बनना शुरू हो जाता है । पाचनतंत्र के अंग, मांसपेशी, आंख, हृदय का वाल्व और धमनी आदि शरीर के किसी भी भाग में पथरी हो सकती है । ऐसा देखा गया है कि पित्ताशय की पथरी पतले – दुबले व्यक्ति की अपेक्षा मोटे व्यक्ति में अधिक होती है, क्योंकि उन्हें अधिक खाना खाने की आदत होती है ।

यकृत और पित्ताशय की थैली में पथरी होने से पेडू में बहुत तकलीफ होती है । इसे यकृत का दर्द (हेपेटिक कोलिक) कहते हैं । पित्ताशय की पथरी इतनी बारीक होती है कि वह पित्ताशय की थैली में आसानी से आ – जा सकती है । इस पथरी की जानकारी रोगी को कभी नहीं होती ।

यदि पथरी थोड़ी बड़ी हो तो वह पित्ताशय की थैली के बाहर नहीं निकल सकती या जब वह बाहर निकलने लगती है तब रोगी को असहनीय पीड़ा होती है । जब पथरी पित्ताशय से मूत्राशय में आती है तब तत्काल ही दर्द शुरू हो जाता है । यों भी पथरी बहुत दु:खदायक होती है । वह एक स्थान से दूसरे स्थान में आती- जाती रहती है । कभी वह पेडू में तो कभी सीने में, कभी कंधे की बाईं ओर तो कभी शरीर के अन्य भागों में पाई जाती है ।

पथरी के कारण पित्तनली में अवरोध खड़ा हो सकता है, किंतु पीलिया नहीं होता । पथरी के कारण ही पित्ताशय की बीमारी अपने आप हो जाती है । यदि दोनों प्रणालियों में पथरी के कारण अवरोध उत्पन्न हो जाए तो पीलिया शरू हो जाता है । ज्वर, ठंड और दर्द के आक्रमण भी शुरू हो जाते है । सामान्यत: इसे  ‘पित्ताशय की बीमारी’ कहते है और वह महीनों या वर्षों तक रोगी को हैरान करती रहती है ।

सामान्यत: उसका उपचार दर्द दबाने वाली औषधियों और शल्यक्रिया के द्वारा किया जाता है, किंतु ऐसे उपचारों के द्वारा रोग पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता । शल्यक्रिया के बाद भी पथरी होती रहती है और रोग के लक्षण पहले जैसे ही बने रहते है ।

इस रोग के रोगी का पाचनतंत्र बिगड़ जाता है । पित्ताशय की थैली और यकृत दुर्बल हो जाते है । उनमें जलन और सूजन शुरू हो जाती है । शरीर दुर्बल और दूषित हो जाता है । पित्ताशय का कार्य विकृत हो जाता है । इसमें खनिज तत्त्वों का संचय होता रहता है । यकृत के कार्यों में भी गड़बड़ी शुरू हो जाती है ।

पित्ताशय की पथरी का कारण Reasons For Gall Bladder Stone

आहार – सम्बन्धी असावधानी, अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट वाले आहार का सेवन, व्यायाम का अभाव आदि से दुर्बल और विषाक्त रोगियों की आँतों में गैस भर जाने से और पित्ताशय की जलन से पथरी बनने लगती है । पित्ताशय की पथरी अथवा गुर्दे की पथरी दोनों रोग एक ही है । स्थान भिन्न – भिन्न होने से उनके लक्षण भिन्न – भिन्न देखने को मिलते हैं । निरोगी लोगों में पथरी नहीं होती । जिसका आरोग्य वर्षों के दोषयुक्त रहन – सहन के कारण गिर गया हो उसे पथरी का शिकार होना पड़ता है । सन्मार्ग पर चलनेवाले और संयमी जीवन जीने वाले को कभी पित्ताशय की पथरी से पीड़ित नहीं होना पड़ता ।

उपवास द्वारा पित्ताशय की पथरी का इलाज Gall Bladder Stone Treatment By Fasting (Naturopathy)

इस रोग से बचने का एक ही रास्ता है : उपवास । उपवास करने से सामान्य स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है, रोग का मूल कारण दूर हो जाता है, यकृत की स्थिति अच्छी हो जाती है और पित्ताशय की पथरी चूर – चूर होकर बाहर निकल जाती है । पर्याप्त आराम के साथ पर्याप्त उपवास करने से रोगी को पूर्ण सफलता मिलती है ।

उपवास छुड़ाने के बाद रोगी को फल और सब्जी खाने में देना चाहिए । आहार में स्वास्थ्यवर्धक तत्वों की जरूरी मात्रा आवश्यक है । आहार में प्रोटीन और स्टार्च दोनों को एक साथ लेना ठीक नहीं है, क्योंकि इससे आँतों में जलन होती है ।

सामन्यतया पित्ताशय की पथरी के ऑपरेशन की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि दूषित तत्त्वों को दूर करके स्वस्थ और नैसर्गिक पोषक तत्त्वों का निर्माण ऑपरेशन से नहीं होता । सभी अंगों को सही रखते हुए शरीर के विषैले पदार्थों को अत्यंत सरलता से बाहर निकालने का एकमात्र उपाय उपवास है । शरीर के सम्पूर्ण विष को पेशाब, मल, उल्टी, पसीना आदि रूपों में बाहर: निकाल कर दूर किया जा सकता है, इसमें शरीर के अवयवों को कटाने की जरूरत नहीं होती ।

उपवास के बाद पथरी टूटने लगती है और आँतों में से बाहर निकल जाती हैं । यकृत प्राकृतिक रूप से काम करने लगता है । शरीर की नियमित और व्यवस्थित सफाई के बाद आरोग्य शीघ्रता से अच्छा होने लगता है ।

यह सब केवल उपवास का चमत्कार है । आठ – दस दिनों के उपवास से हेपेटिक कोलिक के रोगी को भी बहुत लाभ होता है । आवश्यक पथ्य और व्यायाम से रोग फिर पलटकर नहीं आता । ताजे फल, कचूमर और स्टार्चरहित साग – भाजी अधिक लाभप्रद है । जिनके पोषक तत्व खर्च हो चुके हों ऐसे अशक्त रोगियों को शरीर का स्वाभाविक रासायणिक संतुलन पुन: प्राप्त करने के लिए पर्याप्त धैर्य और समय की आवश्यकता होती है । दीर्घकालीन उपवास अधिक लाभप्रद है । यद्यपि इस उपचार में बहुत समय लगता है, फिर भी पथरी बनने में जितना समय लगता है उसकी तुलना में उपवास का समय कुछ विशेष नहीं कहा जा सकता । उपवास और आवश्यक खान पान के कारण अनेक रोगियों को संपूर्णत: आराम और आरोग्य प्राप्त होता है । यदि रोगी ऑलिव तेल और बॉइल सोल्ट जैसी प्रसिद्ध दवाओं, सैकड़ों अन्य दवाओं तथा ऑपरेशन का आश्रय न ले, उपवास से रोग के मूल कारणों को दूर करने का प्रयत्न करे तो उसे बहुत सरलतापूर्वक इस रोग से मुक्ति प्राप्त पायी जा सकती है ।

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