हड्डियों को कैसे मजबूत बनाये और आर्थराइटिस से बचें इन हिन्दी

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प्रत्येक युवक की यह चाहत होती है कि उसकी भुजाएं और शरीर बलवान हो और चेहरे से ज्यादा आकर्षण पूरे शरीर में दिखे, इसके लिए वह तरह-तरह के व्यायाम करते हैं और अत्याधुनिक मशीनी सुविधाओं से युक्ति जिम में भी जाते हैं |मगर क्या आप जानते हैं कि मजबूत भुजाएं और बलिष्ठ शरीर के लिए कैल्शियम का कितना महत्व है |

आइए देखते हैं, हमारे भोजन में यह किस तरह से मिलता है और शरीर को किस प्रकार मजबूती प्रदान करता है | इसके महत्व को आमतौर पर सभी माताएं जानती हैं | बच्चों को दिन में दो-तीन बार जबरन दूध पिलाने वाली आज की माताएं जानती हैं कि कैल्शियम उसकी बढ़ती हड्डियों के लिए कितना जरूरी है | वही पुराने समय की या कम पढ़ी-लिखी ग्रामीण माताएं भी इतना तो अवश्य जानती थी कि दूध पीने से बच्चे का डील-डौल और कद बढ़ता है | यह बच्चे को चुस्त व बलिष्ठ भी बनाता है | भले ही उन्हें दूध में पाए जाने वाले अनमोल कैल्शियम का अधिक ज्ञान ना हो | जो बच्चों की हड्डियों, दांतो के आकार, उनके शरीर के आकार और उन्हें स्वस्थ व मजबूत बनाने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है | इसी कैल्शियम की लगातार कमी के कारण बच्चों के दांत हड्डियां व शरीर कमजोर हो जाते हैं |

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी कैल्शियम का बड़ा महत्व है | कैल्शियम को कमजोर व पतली हड्डियों को मजबूत करने, दिल की कमजोरी, गुर्दे की पथरी को नष्ट करने और महिलाओं के मासिक धर्म से संबंधित रोगों के उपचार में लाभकारी पाया गया है |

इसलिए हमें प्रतिदिन कैल्शियम तत्व निम्न रूप से लेना चाहिए –

  • गर्भवती व दूध पिलाने वाली महिलाओं के लिए 1200 मिलीग्राम
  • 6 महीने से छोटे बच्चों के लिए 400 मिलीग्राम
  • 6 महीने से 1 साल के बच्चों के लिए 600 मिलीग्राम
  • 1 साल से 10 साल की आयु के बच्चों के लिए 800 मिलीग्राम
  • 11 साल से ऊपर सभी आयु वर्ग के लिए 12 मिलीग्राम

रोजाना भोजन में हमें कुछ पदार्थों से कैल्शियम तत्व मिलता रहता है | यह तत्व मुख्य रूप से यह हैं – पनीर, सूखी मछली, राजमा, दही, गरी गोला, सोयाबीन आदि | इसी प्रकार दूध एक गिलास (गाय) से 207 मिलीग्राम, दूध एक गिलास (भैंस) से 410 मिलीग्राम कैल्शियम मिलता है |

प्रेशर कुकर में पकाए गए चावल, मोटे आटे की रोटी में हमें काफी कैल्शियम मिल सकता है | कैल्शियम उचित मात्रा में खाने से हमारी बुद्धि तेज होती है और तर्क शक्ति भी बढ़ती है | हरी पत्तेदार सब्जियों में भी यह तत्व काफी मात्रा में पाया जाता है |

अर्थराइटिस का आयुर्वेदिक समाधान Gathiya Ka Ayurvedic Samadhan

जाड़े में आर्थराइटिस अधिक तेज हो जाती है | इसलिए जोड़ों में अधिक दर्द होने लगता है | एलोपैथी के अनुसार आर्थराइटिस तीन प्रकार की होती है –

1. आस्टियो आर्थराइटिस; इसे बुढ़ापे की या डिजनरेटिव आर्थराइटिस भी कहते हैं |

2. रूमेटाइड अर्थराइटिस; इसमे जलन व दर्द दोनों होते हैं |

3. गाऊ आर्थराइटिस; जोकि यूरिक एसिड के असंतुलन की वजह से होती है | इसमें पैरों में ज्यादा दर्द होता है |

आयुर्वेद के अनुसार, जोड़ों में दर्द इसलिए होता है क्योंकि जोड़ों में टॉक्सिंस यानी जहरीले पदार्थ जमा हो जाते हैं | यह टॉक्सिंस उस समय बनते हैं, जब हम वह खाने की चीजें खाते हैं जिनका आपस में तालमेल नहीं बनता, जैसे – एक साथ अगर हम डेयरी उत्पाद, फ्राइड व रिफाइंड फूड, नानवेज और शराब नियमित लेंगे तो यह पाचन प्रक्रिया पर दुष्प्रभाव डालते हैं | इसके फलस्वरुप टॉक्सिन कोलन में सड़ने लगते हैं और फिर खून के जरिए पूरे शरीर में फैल जाते हैं | अंत में यह जहरीले तत्व जोड़ों में जमा हो जाते हैं | आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार भी आर्थराइटिस तीन प्रकार की होती है –

1. वात आर्थराइटिस; जिसमें जोड़ सूख जाते हैं और मोबिलिटी सीमित हो जाती है.

2. पित्त आर्थराइटिस; इसके चलते जोड़ों पर सूजन आ जाती है दर्द होता है और जलन भी होती है.

3. कफ़ आर्थराइटिस जो कि ओवर ईटिंग और बिना तालमेल वाले खाना खाने से होती है.

आयुर्वेद के अनुसार, अर्थराइटिस के उपचार में सबसे पहला कदम है, कोलन को डिटॉक्स करना | कहने का मतलब यह है कि इसे विषरहित बनाना होता है | इसके लिए यह उपाय करने होते हैं –

  • मोटे अनाज से बचें.
  • खाने में – फल, सब्जियों का जूस, तुलसी चाय, हर्बल चाय और पतली मूंग की खिचड़ी या दलिया लें.
  • रोजाना त्रिफला लें, जिससे कोलोन सिस्टम को डिटॉक्स किया जा सके
  • याद रखें कि त्रिफला केवल लक्जेटिव ही नहीं है, यह कोलन के लिए टॉनिक भी है.
  • जो लोग वात आर्थराइटिस से पीड़ित हैं वह हरीतकी लें.
  • पित्त आर्थराइटिस वाले आमलकी लें.
  • जबकि कफ अर्थराइटिस वाले बिवितकी ले.

आर्थराइटिस में क्या परहेज करें Arthritis Me Parhej 

1. वाट आर्थराइटिस में अनियमित खाना, ठंडा खाना, ठंडे प्राकृतिक खाने जैसे वाइट राइस, दही, खीरा, मूली, आइसक्रीम और शरबत से बचें.

2. इनकी जगह पकाए हुए ओट्स, और गर्म प्रवृत्ति वाले सूप मसाले खाएं.

3. जिन दालों को आसानी से हजम नहीं किया जा सकता जैसे राजमा और सफेद चना आदि इन्हें न खाएं.

4. पित्त आर्थराइटिस में सभी फरमेंटेड फूड, दही, शराब और वाइन, पुरानी चीज और एनिमल प्रोटीन से बचें.

5. खाने की मात्रा को कम कर दें और फ्राइड व रिफाइंड फूड से बिल्कुल बचें.

6. इस रोग से पीड़ित लोगों को को कोलन का डिटॉक्सीफिकेशन सबसे तेजी से फायदा पहुंचाता है.

7. कफ आर्थराइटिस मोटापे की वजह से होती है, क्योंकि इससे जोड़ों में तनाव आ जाता है.

इस रोग से पीड़ित लोगों को न सिर्फ वजन कम करना चाहिए, बल्कि खाने की मात्रा भी कम कर देनी चाहिए और ज्यादा पौष्टिक खाना तो बिल्कुल नहीं खाना चाहिए. शोध से मालूम हुआ है कि जड़ी-बूटियां जैसे शल्लकी, अदरक, हल्दी और अश्वगंधा में भी अर्थराइटिस के दर्द को कम करने के गुण पाए जाते हैं.

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