आक या मदार के फायदे और नुकसान Madar Ke Fayde Aur Nuksaan

madar aak ke fayde aur nuksan hindi me

आक या मदार के फायदे और नुकसान Madar Ke Fayde Aur Nuksaan – Benefits of Madar

आक का पौधा सारे भारत में आसानी से मिल जाता है। यह आमतौर पर दो प्रकार का होता है-जिसमें सफेद फूल आते हैं और दूसरे में कुछ बैंगनी रंग लिए हुए फूल लगते हैं। गर्मी के दिनों में यह पौधा हरा-भरा, फल-फूल दार होता है, जबकि वर्षा होते ही सूखने लगता है। इसकी पत्ती या डंडी को तोड़ने पर वहां से दूध-सा सफेद स्राव होता है। पौधे की ऊंचाई 4 से 12 फुट होती है। पते 4 से 6 इंच लंबे और 1 से 3 इंच चौड़े, आयताकार तथा मोटे होते हैं पुष्प का रंग सफेद और हलका बैंगनी होता है। फल कैरी के समान 3 इंच लंबे और ½  इंच चौड़े होते हैं, जो पकने पर फट जाते हैं। इसमें से सफेद मुलायम रूई निकलती है। रूई से ढके काले रंग के बीज उड़कर यहां-वहां फैल जाते हैं और वर्षा का पानी पाकर फिर से नए पौधे को जन्म देते हैं।

मदार के विभिन्न भाषाओं में नाम

  • संस्कृत- अर्क, श्वेतार्क।
  • हिंदी- आक, मदार।
  • मराठी – पाण्ढरी रुई, आकमदार।
  • गुजराती – धोलो आकड़ों।
  • बंगाली – आकन्द।
  • अंग्रेजी – मदार (Madar)।
  • लैटिन – äcitgifte (Calotropis Gigantia)

मदार के गुण Madar Ke Gun

आयुर्वेदिक मतानुसार आक का रस कटु, तिक्त, लघु, उष्ण प्रकृति, वात-कफु दूर करने वाला,कान-दर्द, दांत-दर्द, कृमि, अर्श, खांसी, कब्ज़, उदर रोग, त्वचा रोग, वात रोग, शोथ नाशक होता है।

यूनानी मतानुसार आक गर्म, कफ को हटाने वाला, पसीना लाने वाला, बलवर्धक है। गठिया, जलोदर, प्रवाहिका, सर्पविष में लाभप्रद है। आक का दूध दाहक, चमड़ी पर फफोला पैदा करने वाला, दाद, खाज, कोढ़, प्लीहा रोग में भी गुणकारी है।

वैज्ञानिक मतानुसार आक के रासायनिक तत्वों का विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसकी जड़ और तने में एमाईरिन (Amyrin), गिग्नटिओल (Giganteol) तथा केलोट्रोपिओल (Calotropiol) के अलावा अल्प मात्रा में मदार ऐल्बन, फ्लेबल क्षार भी मिलता है। दूध में ट्रिप्सिन, उस्कैरिन, केलोट्रोपिन तथा केलोटोक्सिन तत्व मिलते हैं।

मदार के हानिकारक प्रभाव Madar Ke Nuksaan

आक की जड़ की छाल अधिक मात्रा में देने से आमाशय और आiतों में जलन, दाह, क्षोभ उत्पन्न होकर जी मिचलाहट यहां तक कि उलटी भी होने लगती है। इसका ताजा दूध अधिक मात्रा में देने से विष का कार्य करता है। अत: प्रयोग में मात्रा का विशेष ध्यान रखें।

मदार के प्रयोग की मात्रा

दूध एक-चौथाई से तीन-चौथाई ग्राम (250 से 750 मिली ग्राम), जड़ की छाल का चूर्ण आधा से एक ग्राम, पत्तों का चूर्ण 300 मिलीग्राम से 1 ग्राम, पत्तों का रस 1 से 5 बूँद, पुष्प 1से 3 ग्राम।

विभिन्न रोगों में मदार के प्रयोग Madar Ke Fayde (Benefits)

मदार को कई रोगों के इलाज में प्रयोग किया जाता है | आइये जानते हैं इनमें से कुछ के बारे में – 

कील-मुहांसे Keel Muhase Ka Upchar: आक के दूध में हलदी पीसकर सोते समय कील मुंहासों पर लगाते रहने से कुछ दिनों में पूर्ण लाभ मिलेगा और चेहरा खिल उठेगा।दांत रोग Teeth Rog Ke Upchar Me : हिलते हुए दांत की जड़ में एक-दो बूंद आक का दूध लगाने से वह आसानी से निकल जाता है। आक की जड़ के टुकड़े को दुखते हुए दांत से दबाने से दर्द कम हो जाता है।

खुजली Khujali Theek Karne Ke Liye Madar: आक के 10 सूखे पते सरसों के तेल में उबालकर जला लें। फिर तेल को छानकर ठंडा होने पर इसमें कपूर की 4 टिकियों का चूर्ण अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भर लें। खाज-खुजली वाले अंगों पर यह तेल 3 बार लगाएं।

दाद के इलाज में Daad Ka Upchar : शहद और आक का दूध बराबर की मात्रा में मिलाकर नियमित रूप से दिन में 3 बार लगाने से दाद दूर हो जाएगी।

बिच्छू काटने पर Bichchoo Katne Par: आक का दूध दंश पर बार-बार लगाएं, विष दूर होगा।

आधासीसी का सिर दर्द Aadhashishe Ke Dard Ke Upchar Me: दो छोटे-छोटे पत्तों का जोड़ा जो आक के पत्तों के बीच में लगा होता है,गुड़ में लपेटकर सूर्योदय के पूर्व सेवन करें। पहली मात्रा से ही लाभ मालूम पड़ेगा। पूरे लाभ के लिए यह प्रयोग 4-5 दिन तक करें।

दमा Dama Ka Ilaj : आक की जड़ एवं पत्तों का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिलाकर एक चौथाई मात्रा में काली मिर्च का चूर्ण मिला लें। एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम शहद के साथ एक हफ्ते तक सेवन करने से दमे में बहुत लाभ होगा।

सूजन और दर्द Sujan Aur Dard Ka Gharelu Upchar: पीड़ित अंग पर अरंडी का तेल लगाकर आक का गर्म पता बांधे।

फोड़े-फुसी Fode Funsi Ke Upchar Me: आक की जड़ पानी में पीसकर तैयार किए लेप को फोड़े-फुसियों पर लगाएं।

सर्प विष Sanp Ke Vish Ke Upchar Me: आक का दूध दंश पर बार-बार लगाएं और इसकी जड़ पानी में पीसकर पिलाएं।

छोटे सफेद दागों पर Safed Dag Ka Upchar: सेंधानमक आक के दूध में घिसकर दागों पर लगाएं।

वात रोगों में : तिल के तेल में आक की जड़ को पका लें। छानकर तेल की इस पीड़ित अंगों पर मलें।

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*