क्यों होता है पीड़ाकारी मासिकधर्म और क्या है इसके उपाय Menstrual Pain Causes and Solutions

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क्यों होता है पीड़ाकारी मासिकधर्म और क्या है इसके उपाय Menstrual Pain Causes and Solutions In Hindi –

सहज स्वाभाविक और शुद्धिकरण की क्रिया होकर भी मासिकधर्म नारी की सहनशीलता का इम्तिहान होता है. उससे जुड़ी असुविधाओं को सहज भाव से निभाने से जीवन सुखमय होता है. लेकिन सामाजिक प्रगति के साथ जैसे-जैसे जीवन में परेशानियां बढ़ी हैं और स्त्री-पुरुष के बीच दायित्व विभाजन के पुराने ढांचे टूटे हैं, वैसे-वैसे मासिक श्राव की सामान्य क्रिया अप्रिय और अस्वास्थ्यकर होती गई है.

जीवनशैली में जो बड़ा परिवर्तन आया है और विवाह तथा मातृत्व की उम्र में जो वृद्धि हुई है, उसके कारण मासिक धर्म के कष्टकर होने के मामले तेजी से बड़े हैं. कामकाजी महिलाओं के लिए इसकी महत्ता बहुत ज्यादा है, क्योंकि उनके कर्तव्य पालन में यह बाधक बन सकता है. रोग विशेषज्ञों के मुताबिक उन्नत समाजों और अभिजात वर्ग की स्त्रियों में पीड़ादायक मासिक स्राव के मामले इसीलिए बहुत ज्यादा है.

घर पर मां, बड़ी बहन, चाची, ताई, मौसी, बुआ आदि का व्यवहार और स्कूल कॉलेज में सभी पार्टियों का मासिक श्राव के प्रति दृष्टिकोण भी इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. यदि बचपन से ही मन में मासिक धर्म के प्रति डर बैठ जाए कि यह एक तकलीफदेह क्रिया है तो बड़े होने पर डर के सच होने की संभावना बढ़ जाती है.

प्रायः स्त्री अपने व्यस्त जीवन में किसी न किसी दौर में मासिक धर्म के समय कष्ट महसूस करती है. यह कष्ट तीन तरह का हो सकता है – spasmodic Dysmenorrhea, congestive dysmenorrhea, membranous dysmenorrhea

इनमें सबसे आम Spasmodic Dysmenorrhea है, जो प्रायः 15 से 16 की उम्र में शुरू होता है, 25 से 28 की उम्र से कम होने लगता है और 30 के आस पास बिलकुल शांत हो जाता है. इस विकार में मासिक धर्म शुरु होने के कुछ घंटे पहले से या उसी रोज पेट के निचले हिस्से, पेट और जांघों के बीच भीतरी हिस्सों में जोर से दर्द उठता है. यह दर्द या तो लगातार बना रहता है या रुक-रुक कर उठता है; जैसा कि मरोड़ पैदा होने पर होता है. पहले आधे – 1 घंटे के लिए इसकी तीव्रता इतनी अधिक भी हो सकती है, कि बेहोशी छा जाए. हालात तेजी से बिगड़ती हुई मालूम होती है और जी मिचलाने लगता है और उल्टियां होने लगती है, सिर में दर्द भी हो सकता है, पेट में खलबली भी मच सकती है. लेकिन यह लक्षण प्रायः 12 से 24 घंटे के अंदर खुद-ब-खुद खत्म हो जाते हैं.

50% से अधिक महिलाएं Spasmodic Dysmenorrhea का कष्ट सहती हैं. यह विकार कन्या के रितुमती होने की प्रायः दो, तीन या चार साल बाद प्रकट होता है. अगर यह कष्ट हो तो अधिक परेशान नहीं होना चाहिए. इसके होने का एक अर्थ यह भी है कि शरीर के भीतर बसी प्रजनन प्रणाली में डिंब के पकने और फूटने की सामान्य क्रिया अच्छी प्रकार से हो रही है तथा कन्या गर्भधारण की क्षमता रखती है.

अधिकांश मामलों में विवाह और विवाह के बाद संतान, स्त्री को Spasmodic Dysmenorrhea से स्वतंत्र कर देते हैं. पर अविवाहित महिलाओं में यह विकार प्रायः देर तक भी बना रह सकता है.

यह रोग होने पर मासिक श्राव की कुल मात्रा प्रायः औसत से कुछ कम होती है और जमे हुए खून के कतरे भी पेशाब में आ सकते हैं. जबकि रज के रूप में आने वाले खून का यह गुण होता है कि वह सामान्यतया जमता नहीं है.

Spasmodic Dysmenorrhea से निजात पाना मुश्किल नहीं है. रजोधर्म के प्रति स्वस्थ और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना पहली शर्त है. पौष्टिक आहार, नियम से व्यायाम, स्वस्थ विचार और जीवन में सुख संतोष, इस कष्ट से छुटकारा पाने के सार्थक उपाय हैं. इन मूल जीवन नियमों के जरिए कब्ज और एनीमिया से भी मुक्ति पाई जा सकती है. रजोधर्म के दिनों में रोजाना गर्म पानी से स्नान करना भी लाभप्रद होता है. यह पीड़ा से राहत दिलाता है.

दर्द से राहत पाने के लिए कोई भी साधारण दर्द निवारक जैसे की पेरासिटामोल, एस्प्रिन, नेपरोक्सन जैसी दवाएं ली जा सकती है. लेकिन यह दवाएं अंधाधुंध नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि इनका गलत इस्तेमाल करने से शरीर पर बुरा असर पड़ सकता है. 

यदि हर बार मासिक धर्म के साथ असहनीय पीड़ा हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना उचित होता है. जरूरी होने पर कुछ महीनों के लिए हारमोनल उपचार भी दिया जाता है, जिसमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन उपचार का आधार होते हैं, सिर्फ बहुत गंभीर और असाध्य साबित होने वाले मामलों में ऑपरेशन की जरूरत होती है.

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मासिक कष्ट का दूसरा आम रोग हैं Congestive Dysmenorrhea. जो प्रायः 25 से 30 वर्ष की उम्र के बाद होता है इसमें मासिक स्राव के 3 दिन पहले से पेट के निचले और कमर में दर्द होने लगता है. यह दर्द मासिक स्राव शुरू होने तक तकलीफ देता है. कब्ज और पेट में गैस की शिकायत भी बनी रहती है और अधिक शारीरिक श्रम या दौड़ धूप से प्रायः बढ़ जाता है.

Congestive Dysmenorrhea प्रायः अपने से नहीं होता है. उसका होना भी किसी शरीर के भीतरी विकार का लक्षण है. पेट के नीचे की सूजन इस कष्ट के कारण हैं. लेकिन गर्भाशय की रसौली (Fibroid), पलटे हुए गर्भाशय और डिंब ग्रंथियों की सिकुडन से भी यह मानसिक कष्ट पैदा होता है. इसीलिए अधिकतर मामलों में मूल विकार के हिसाब से दूसरी परेशानियां भी पाई जाती हैं. मासिक श्राव की मात्रा औसत से अधिक हो सकती है. योनि सहवास कष्टप्रद हो सकता है और गर्भधारण न हो पाने की पीड़ा मन में हो सकती है. इन परेशानियों से राहत पाने के लिए डॉक्टर से सलाह ले. भीतरी जांच से मूल विकार का पता लग जाता है और उसके मुताबिक इलाज लेने से ही कष्ट जड़ से दूर हो पाता है. साथ ही ऊपर बताए गए जीवन नियम अपनाना उपयोगी सिद्ध होता है. कुछ स्त्रियां आराम पाने के लिए अपनी मर्जी से पेट साफ करवाने वाली दवाएं ले लेती हैं जो कि ठीक नहीं है.

Membranous Dysmenorrhea मासिक कष्ट की तीसरी किस्म है. यह कम ही मामलों में पाया जाता है और प्रायः पारिवारिक विकार के रूप में होता है. मासिक स्राव के समय बहुत जोरों का दर्द होता है और गर्भाशय की आंतरिक सतह, झिल्ली नुमा टुकड़ों में रज के साथ बाहर आती है. कभी-कभी पूरी की पूरी झिल्ली भी निकलती है, जिससे पीड़ा बहुत बढ़ जाती है. कुछ महिलाओं में साधारणतया भी रज के साथ छोटे-छोटे टुकड़े भी निकलते हैं, जिनके प्रति कतई चिंतित नहीं होना चाहिए.

Membranous Dysmenorrhea होने पर, इलाज के लिए स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए, हारमोनल औषधियां, इस विकार से राहत दिलाती हैं. लेकिन कुछ मामलों में गर्भाशय ग्रीवा का मुंह चौड़ा करके भीतरी सफाई करना अधिक फायदेमंद साबित होता है. बिल्कुल असाध्य मामलों में गर्भाशय को निकालने का निर्णय भी लिया जा सकता है.

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