गर्भावस्था में जेनेटिक काउंसलिंग जरूरी क्यों होती है Prenatal Genetic Counseling During Pregnancy

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गर्भावस्था में जेनेटिक काउंसलिंग जरूरी क्यों होती है Prenatal Genetic Counseling During Pregnancy – Tips In Hindi

हर मां के लिए शिशु, मां के दिल का टुकड़ा और जीवन का सबसे खूबसूरत तोहफा होता है. प्रत्येक मां, अपने शिशु को दुनिया की हर बुरी नजर से बचाकर रखना चाहती है. लेकिन क्यों ना, यह कोशिश शुरू से ही कर दी जाए. उसकी सुरक्षा की तसल्ली गर्भ में होने पर ही कर ली जाए.

शिशु का जन्म, स्त्री का मां बनना, इस सृष्टि की सबसे प्यारी घटना और स्त्री के लिए स्वर्गीय सुख की अनुभूति देनेवाला एहसास भी है. अपने आंचल में अपने ही शरीर के एक अंश को यूं ही हंसता मुस्कुराता देख मां धन्य हो उठती है. मगर थोड़ी सी लापरवाही या नासमझी से इस खुशी में ग्रहण लग जाए, तो मां बहुत अधिक तड़पती है. बच्चे को जन्म से ही कोई बीमारी हो, तो पूरे परिवार को इसका दुख झेलना पड़ता है.

आपके साथ भी कहीं ऐसा ना हो इसके लिए जिनेटिक काउंसलिंग जरूरी है. ताकि कोई भी शिशु उम्र भर कोई तकलीफ सहने के लिए मजबूर ना हो. किसी मां का आंचल आंसुओं से ना भीगने पाय.

अगर आपके परिवार में वंशानुगत रोगों का इतिहास है या जन्मजात बीमारियों की अधिकता रही है, तो जिनेटिक काउंसलिंग या अनुवांशिक परामर्श आपके लिए भी बहुत जरूरी हो जाता है.

जिनेटिक काउंसलिंग से लाभ Genetic Counseling benefits In Hindi

जिनेटिक काउंसेलिंग से आपको प्रेगनेंसी के दौरान यह ज्ञात हो जाता है, कि आपके गर्भस्थ शिशु को कोई आनुवंशिक रोग या दोष तो नहीं है.

गर्भधारण करने से पहले जिनेटिक काउंसलिंग कराने से यह पता चल सकता है, कि भविष्य में होने वाली संतान के आनुवंशिक रोग से ग्रसित होने की कितनी संभावना है.

जिन परिवारों में आनुवंशिक रोगों का इतिहास है, उन परिवारों के दंपत्तियों को गर्भधारण से पूर्व जिनेटिक काउंसलिंग जरूर करनी चाहिए, ताकि यह पता चल सके कि उनकी भावी संतान को कौन-कौन से आनुवंशिक रोग हो सकते हैं.

जिनेटिक काउंसलिंग कराना कब लाभकारी हो सकता है When Genetic Councelling Can Be Beneficial

जब आपको लगे कि आप में या आपके परिवार में आनुवंशिक रोग या जन्मजात दोष है, जब आप 35 वर्ष की उम्र के पश्चात गर्भधारण करने जा रही हों, आपकी किसी संतान की या किसी निकट संबंधी की कोई आनुवंशिक रोग, जन्मजात दोष हो या मंदबुद्धि हो, आपकी दो या दो से अधिक गर्भपात हो चुके हो, या दो से अधिक संतानों की बचपन में ही मृत्यु हो चुकी हो. ऐसे स्थिति में आपको जेनेटिक काउंसलिंग जरूरी है.

आपकी नौकरी या दिनचर्या या आपका स्वास्थ्य आपके गर्भस्थ शिशु के लिए कोई खतरा पैदा कर सकता हो, उदाहरण के तौर पर रेडियोधर्मी किरणों के प्रभाव, जैसे कि एक्सरे आदि, शराब का सेवन या किसी प्रकार का संक्रमण, जो गर्भस्थ शिशु तक पहुंच सकता है. ऐसे में जेनेटिक काउंसलिंग से यह निर्धारित किया जा सकता है, कि कहीं कुछ हानिकारक तत्वों से आपके गर्भस्थ शिशु को कोई हानि तो नहीं पहुंचेगी.

गर्भावस्था की अन्य जरूरी जानकारियां – 

कौन लक्षण होने पर जेनेटिक काउंसलिंग जरूरी है Symptom That Tell Us To Go For Genetic Councelling

र्भावस्था के दौरान निम्नलिखित लक्षण खतरे की घंटी हो सकते हैं. इसलिए इन हालात में सावधान रहना जरूरी है. अगर आपका रक्त स्राव होने लगे, तो गर्भावस्था में रक्तस्राव खतरनाक हो सकता है.

  • अगर पेट में या जोड़ों का दर्द हो रहा हो या ऐंठन हो;
  • योनि से किसी तरह या चिपचिपे पदार्थ का स्राव हो रहा हो;
  • लगातार मिचली या उबकाई आना;
  • लगातार चक्कर आना या बेहोश हो जाना;
  • आंखों कि आगे अंधेरा या धुंधलापन आना, किसी बिंदु का दिखना;
  • चेहरा, हाथ और पांव में अचानक सूजन आना;
  • सिर में असहनीय पीड़ा होना;
  • कम मात्रा में और काफी देर बाद पेशाब का होना’
  • ज्यादा बुखार का होना जैसे 100 डिग्री फारेनहाइट से अधिक या जोर से ठंड लगकर बुखार आना;
  • यदि बच्चे का हिलना डुलना अचानक कम होना महसूस होता है;
  • अन्य कोई लक्षण जो आपको असामान्य से लगते हो.

अगर उपरोक्त में भी कोई भी लक्षण दिखे तो फौरन अपने डॉक्टर से संपर्क करें

पिता के सहयोग की आवश्यकता क्यों होती है Pita Ka Sahyog Jaroore Hai

स्त्री पुरुष का सहयोग होने पर ही तो एक गर्भ पनपता है. एक शिशु का जन्म होता है और अगर इस शिशु की परवरिश भी माता पिता दोनों की साझेदारी से हो तो शिशु के तेज विकास में तो मदद मिलती ही है, साथ ही पिता को खुशी भी मिलती है.

पिता किस मायने में भिन्न होते हैं How Father Are Different

पुरुष बच्चों के साथ अलग-अलग तरह से खेलते हैं. वह बच्चों को सक्रिय बनाते हैं. पिता का स्पर्श, दुलार बच्चे के विकास में बहुत सहायक होता है. पिता का दृष्टिकोण भिन्न होता है. पिता दिनभर की दौड़ धूप के बाद घर वापस आता है, वो बच्चे उसके लिए मन-बहलाव के साधन होते हैं. उनके बीच रहना उसे अच्छा लगता है, इससे मां को थोड़ी देर आराम भी मिल जाता है.

पिता अनुशासन रखने में अधिक कामयाब होते हैं Father Are Better To Keep Discipline In Baby

बच्चों के साथ पिता का व्यवहार थोड़ा कठोर व द्रढ़ होना चाहिए. पर निर्दय नहीं.

बच्चों को कभी मारना या गाली नहीं देनी चाहिए. सही संतुलन (प्यार व सख्ती) स्थापित होने पर अनुशासन अपने-आप और सरलता से आएगा. इससे मां को थोड़ी राहत भी मिलेगी. पिता की अनुपस्थिति में मां भी बच्चों में अनुशासन पैदा कर सकती है, पर इसके लिए उसे बहुत कोशिश की जरूरत होगी. कुछ पिता, मां के सामने बच्चों का पक्ष लेते हैं, इससे बच्चों की नजर में मां की अहमियत कम होती है.

बच्चों की देखभाल में पिता की भूमिका महत्वपूर्ण है Role of Father Is Important In Baby Care

पत्नी के गर्भावस्था के दौरान आपके मन में कई तरह की भावनाएं पैदा हो सकती हैं.

गर्भधारण के बाद, स्त्री की काम-वृत्ति पर जबरदस्त सहानुभूति, संभाल व सम्मान की आवश्यकता होती है. अगर पत्नी के हार्मोन में बदलाव आ रहा है या उसे कोई शारीरिक कष्ट हो तो उसका ध्यान अवश्य रखें.

कभी-कभी पुरुष, पत्नी के एहसास की अनिच्छा का अलग ही अर्थ निकालते हैं. उन्हें पत्नी का अपने प्रति प्रेम संदिग्ध लगने लगता है. पर ऐसी बात नहीं है. प्रेम बहुत व्यापक है, इसे केवल शारीरिक संबंधों की सीमा तक ही नहीं बांधा जा सकता है.

प्रसव नजदीक आने पर क्या करें Delivery Paas Hone Par Kya Kare

जैसे-जैसे प्रसव नजदीक आता है, अधिकांश पतियों में अपनी पत्नी को लेकर चिंता बढ़ती है. इसकी एक वजह यह होती है कि पति को पत्नी की सुरक्षा की चिंता रहती है. इस मामले में आप प्रसव के समय पत्नी के साथ रहकर उसकी हिम्मत बढ़ा सकते हैं. वैसे आजकल प्रसव बहुत सुरक्षित हो गया है.

बच्चे के जन्म के बाद पिता की भूमिका Role of Father After Delivery of Baby

सही मायने में बच्चे की देखभाल में पिता की भूमिका की शुरुआत उसके जन्म के बाद ही होती है. रात रात भर बच्चे को लोरी गाकर सुनाना, नैपकिन बदलना, बीमार होने पर उसे दवाएं देना आदि बातें रोजमर्रा की घटनाएं बन जाती हैं.

बच्चा होने के बाद आपको महसूस हो सकता है, कि आपकी पत्नी आपको पहले जैसा प्यार नहीं करती. वह सारा प्यार अपने बच्चे पर न्योछावर करने लगती है. इससे पिता के मन में बच्चे के प्रति ईर्ष्या का भाव भी पैदा हो सकता है. ऐसी स्थिति में बच्चे से इर्ष्या रखने की बजाए पत्नी से खुल कर बात कर लेना ज्यादा अच्छा होगा. इससे आप को यकीन आ जाएगा कि आपकी पत्नी आपको पहले जितना ही प्यार करती है. बस उसके पास इजहार करने का वक्त ही नहीं रह गया.

बच्चा जब साल डेढ़ साल का हो जाए, तब क्या करें When Baby is 1 and 1/2 Years Old

बच्चा जब साल-डेढ़ साल का हो जाए, तो पिता का पहला काम है कि बच्चे को अनुशासित बनाने में पत्नी की मदद करना. बच्चे की गलतियों को कभी नजरअंदाज ना करें और ना ही उसकी नजर में मां की अहमियत कम होने दें.

पिता बच्चों के लिए समय निकालें Father Must Spare Time For Kids

आप चाहे जितने व्यस्त हो, पर बच्चे के लिए समय जरूर निकालें. बच्चों के समुचित विकास के लिए यह बहुत जरूरी है. लड़कों के लिए तो ख़ास तौर से, यह और भी बहुत जरूरी हो जाता है.

लड़कों की जीन संरचना, इस प्रकार होती है कि दिन में चार-पांच घंटे पुरुषों के साथ उसका रहना बहुत जरूरी होता है. लड़के पिता व घर के अन्य पुरुषों के साथ रहकर साथ-साथ काम करते हुए पुरुष होने सीखते हैं और लड़कियां अपनी मां और शिक्षिकाओं के साथ रहकर स्त्री होना सीखती हैं. पर अधिकांश लड़कों को पुरुषों के संपर्क में रहने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता. नतीजतन वह सही अर्थ में पुरुष नहीं बन पाते, सिर्फ पुरुष होने का दिखावा करते हैं.

बचपन में पिता का पर्याप्त संपर्क ना मिलने का दर्द बच्चे जीवन भर नहीं भूल पाते. यह अकेलापन बच्चों के कोमल मन पर अमिट छाप छोड़ देता है.

बेटी के अंदर आत्मविश्वास लाने के लिए भी माता-पिता दोनों का उसके साथ पर्याप्त समय बिताना जरूरी है. पिता का साथ बेटी में आत्म सम्मान की भावना का संचार करता है. इससे उसके अंदर विनोदवृत्ति व बुद्धिमत्ता आती है और लड़कों के साथ सहज भाव से बात करने का आत्मविश्वास भी आता है.

बच्चों को प्यार और समय दें Give Love, Affection And Time To Baby

अकेले पिता या मां, किसी के लिए भी बच्चे की परवरिश करना आसान नहीं होता. खासतौर से पिता के लिए रोजी-रोटी कमाना और साथ ही बच्चे को मां की ममता और दुलार देना. यानी पिता व मां की दोहरी भूमिका निभाना, बहुत कठिन होता है. अगर मां की असमय मृत्यु हो जाए, तब तो पिता का कर्तव्य और भी बढ़ जाता है. पिता को पूरी कोशिश करनी चाहिए कि वह मां के हिस्से का प्यार भी अपने बच्चे को दे. उसे कभी अकेलापन महसूस ना होने दें. उसकी खाने-पीने, पढ़ाई-लिखाई जैसी सुख सुविधाओं सबका ध्यान रखें.

जिम्मेदारी के साथ कैरियर पर भी ध्यान दें

बच्चों की देखभाल और अपने कैरियर में सही संतुलन बनाना जरूरी है. नहीं तो मुमकिन है, कि ना तो आप अपने काम को सही अंजाम दे पाएंगे और ना ही बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारियां ही सही ढंग से निभा पाएंगे.

पिता की जिम्मेदारी जितना लोग समझते हैं, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. यदि पिता बच्चे की परवरिश में आवश्यक भूमिका निभाएं, तो बच्चों का विकास बहुत तेजी से होता है. साथ ही बच्चों का प्यार और नज़दीकियां पाकर आप भी महसूस करेंगे कि आपकी जिंदगी में इतनी खुशियां आ गई हैं.

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