थैलेसीमिया रोग से बचाव और उपचार Thalassemia Rog se Bachav Aur Upchar

थैलेसीमिया एक ऐसा रोग है जिसमें बच्चे के शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर में कमी आ जाती है. यह रोग अपने लक्षण आमतौर पर 3 माह की आयु के पश्चात दर्शाता है. इस रोग का खतरा उन बच्चों को अधिक होता है जिनके माता पिता में से किसी एक को या दोनों के यह रोग होता है. इस रोग में शरीर में रक्त की कमी हो जाती है (Thalassemia Rog ki pahchan 3 Month ke baad hoti hai) हीमोग्लोबिन पूरे शरीर में ऑक्सीजन का संचार करने में सहायता करता है. इसकी कमी के कारण इस कार्य में बाधा आती है. थैलेसीमिया के शरीर में लाल रक्त कणों का निर्माण निम्न स्टार पर होता है. कम मात्रा मे जिन कणों का निर्माण हो जाता है, वे भी कुछ समय बाद खत्म हो जाते हैं. इस स्थिति में बार-बार खून चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है. अगर समय पर बच्चे को खून न चढ़ाया जाए तो उसकी जान का खतरा हो सकता है. परंतु बार बार जब शरीर में रक्त चढ़ाया जाता है, तो आयरन के स्तर में वृद्धि हो जाती है. यह हृदय, फेफड़ों और यकृत के लिए हानिकारक होता है(Thalassemia Rog Jyadater Bachho me Hota hai)

हमारे शरीर में मौजूद लाल रक्त कण 110-120 दिनों तक जीवित रहते हैं. थैलेसीमिया होने पर इनका जीवन घटकर 10-25 दिन रह जाता है. यह शरीर में ऑक्सीजन व कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन करते हैं. फेफड़ों में मौजूद ऑक्सीजन को श्वसन संस्थान तक पहुंचाने की प्रक्रिया को निभा कर ये मनुष्य को जीवित रखते हैं(Thalassemia Rog se Bachhe ke Sharir me HG me kami aa jati hai)

हड्डियों में मौजूद एक तत्व, जिसे बोन मैरो या अस्थि मज्जा कहा जाता है, लाल रक्त कणों के निर्माण में मदद करता है. बोन मैरो की मदद से ही रक्त में मौजूद लगभग सभी तत्वों का निर्माण होता है. हीमोग्लोबिन के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाता है(Thalassemia Rog Anuvanshik bhi ho Sakta hai). हीमोग्लोबिन हमारे रक्त को लाल रंग प्रदान करता है. यह लाल रक्त कणों में मौजूद प्रोटीन है जिसकी मदद से शरीर के सभी अंगो में ऑक्सीजन की पूर्ति होती है. यह दो प्रकार के प्रोटीन से बनता है – अल्फा और बीटा प्रोटीन. इसकी मदद से शरीर के सभी अंगो में संचार के लिए ऑक्सीजन का संयोजन करने में सहायता मिलती है.

थैलेसीमिया से पीड़ित रोगियों में विकास की गति धीमी रहती है( Thalassemia Rog me Sharir me blood ki kami ho jati hai) उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिस कारण उन्हें संक्रमण का खतरा रहता है. कुछ स्थितियों में चेहरे व सिर की हड्डी का विकास असामान्य तौर पर होने लगता है. इससे यकृत व प्लीहा का आकार भी प्रभावित होता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर वर्ष  7-10 हजार थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चों का जन्म होता है. भारत की जनसंख्या का 3.4 प्रतिशत भाग इस रोग से पीड़ित हैं.

थैलेसीमिया रोग के प्रकार Thalassemia Rog ke Prakar

थैलेसीमिया माइनर Thalassemia Minor यदि बच्चे के माता-पिता में से किसी एक को थैलेसीमिया की बीमारी है, तो बच्चे को थैलेसीमिया माइनर होने का खतरा रहता है. कई बार रोगी को आभास भी नहीं होता कि वह इस रोग से ग्रस्त है. कुछ रोगियों में एनीमिया की बीमारी भी हो सकती हैं.

थैलेसीमिया मेजर : माता पिता दोनों को थैलेसीमिया माइनर होने पर बच्चे को थैलेसीमिया मेजर होने का ज्यादा खतरा रहता है. थैलेसीमिया मेजर से ग्रसित बच्चों को हर 3 हफ्तो में खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है. ऐसा न करने पर उसकी जान भी जा सकती है. समय पर अगर शरीर में रक्त की पूर्ति होती रहे, तो रोगी का जीवनकाल कुछ हद तक बढ़ सकता है. बार-बार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन के स्तर में वृद्धि होती है जो हृदयाघात का कारण बनता है.

थैलेसीमिया रोग के क्या लक्षण होते है Thalassemia ke Kya Lakshan Hote hai

  1. शरीर कमजोर हो जाना Sharir Kamjor ho Jana
  2. थकान महसूस होना Thakan Mahsus Hona
  3. सांस लेने में दिक्कत Saans lane me Dikkat
  4. बीमार व्यक्ति का चेहरा मुरझाया हुआ होता है Bimar Vyakti ka face Murjhaya hua hota hai
  5. व्यबहार में अंतर, हर बात पर गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन होना Patient ke behavior me change
  6. त्वचा का रंग पीला पड़ जाना Skin ka color Peela Pad Jana
  7. बच्चे का धीमी गति से विकास होना Bachhe ka Dhimi Gati se Vikash Hona
  8. मूत्र के रंग में परिवर्तन Mutre ke Rang me Change
  9. चेहरे व सिर की हड्डियों का असामान्य रूप से बढ़ना
  10. भूख में कमी व अन्य पेट संबंधी समस्याएं Bhuk na Lagna

थैलेसीमिया के लक्षण रोगी की गंभीरता पर निर्भर करते हैं. यदि रोगी के शरीर में अल्फा या बेटा में से किसी एक प्रोटीन की कमी है तो वह कोई लक्षण नहीं दर्शाता. दोनों प्रोटीन का निर्माण होने में कमी के कारण थैलेसीमिया रोग की उत्पत्ति होती हैं. कुछ बच्चे जन्म के 2-3 माह बाद भी इस रोग के लक्षण दिखाने लगते , वही कुछ बच्चों में 2 वर्ष की उम्र के बाद रोग के लक्षण विकसित होते हैं.

थैलेसीमिया रोग से कैसे करें बचाव Thalassemia Rog se Kaise Kare Bachav

चिकित्सा जगत में अब तक इस रोग का कोई 100 प्रतिशत सफल इलाज नहीं है. पर कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखकर इस रोग व इसकी विषमताओं से राहत पाना मुमकिन है. शादी हमारे जीवन का एक अहम फैसला होती हैं. हमारे देश में शादी के पहले लड़के लड़की की कुंडली मिलाई जाती हैं. इसके साथ ही जरूरी है स्वास्थ्य की अनुकूलता को महत्व देना. थैलीसीमिया जैसे घातक रोग से बचाव के लिए शादी के पूर्व लड़के लड़की की रक्त की जांच करवाई जानी चाहिए. इससे आप पूर्व में यह जान सकते है कि जिसे आप अपना जीवन साथी चुन रहे हैं वह कहीं थैलेसीमिया का शिकार तो नहीं. यह भविष्य में आप के बच्चे के लिए जरूरी है( Thalassemia Rog me Bachav me Hi Savdhani hai)

अगर दोनों में से किसी एक को भी थैलेसीमिया है तो जन्म लेने वाले बच्चों को थैलेसीमिया माइनर होता है. यदि दोनों इस रोग से पीड़ित है तो बच्चा थैलेसीमिया मेजर से ग्रस्त होता है. इसमें उसकी जान को खतरा रहता है. गर्भधारण के चार महीने के अंदर ही गर्भ में पल रहे शिशु की जांच करा लेनी चाहिए. अगर शिशु थैलेसीमिया से पीड़ित है तो आमतौर पर चिकित्सक गर्भपात कराने की सलाह देते हैं.हमारे समाज में थैलीसीमिया जैसे गंभीर रोग को लेकर आज भी अज्ञानता है.

लोग इस बात से अनजान है कि यह रोग उनके जीवन में उनके बच्चों के लिए कितना खतरनाक है. इससे बचाव का श्रेष्ठ तरीका है इसके प्रति जागरूकता. थैलेसीमिया माइनर के रोगी को सही उपचार मिलने पर उसकी जान से खतरा दूर किया जा सकता है. परंतु थैलेसीमिया मेजर के रोगियों के लिए आज भी कोई सफल इलाज नहीं है. बच्चे में थैलेसीमिया के लक्षण नजर आते ही चिकित्सकीय परामर्श ले( Thalassemia Rog par puri Dunia me Shodh Jari hai).

विटामिन सी युक्त पदार्थों के सेवन से परहेज करें. विटामिन सी शरीर में आयरन ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाता है. यह थैलेसीमिया के रोगियों के लिए हानिकारक होता है.

थैलेसीमिया के रोगी के रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर 11-12 बनाए रखने का प्रयास करें. हीमोग्लोबिन की कमी से शरीर में खाद्य पदार्थों से अधिक आयरन एकत्रित होता है. आइरन से हृदयाघात का खतरा बढ़ जाता है. अपने आहार में दूध की मात्रा भी बढ़ाएं. दूध में मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करता है. यह शरीर में आयरन अवशोषण क्षमता को भी कम करता है( Thalassemia occurs in about 280 million people )

कुछ रोगियों को हर दिन 10-15 के अंतराल पर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती हैं. उपचार का खर्च न उठा पाने के कारण कुछ लोगों की मृत्यु 12-15 वर्ष की आयु में ही हो जाती है. सही उपचार मिलने पर वह 25-28 वर्ष तक जीवित रह सकता है. निवेदन है कि आप साल में कम से कम 2 बार स्वेच्छा से रक्तदान करें. आपके द्वारा दान किया गया रक्त किसी मासूम के लिए जीवन दान बन सकता है( Thalassemia me Samay par Medicine le Aur Ilaj Pura kare)

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