योग के द्वारा मुक्ति कैसे ! Yog se Mukti Kaise!

कहा जाता है कि चिंता, चिता से भी बढ़कर दुख को प्रदान करने वाली होती है. चिता पर सोया व्यक्ति संसार की सभी चिंताओं से मुक्त हो जाता है, परंतु चिंता की गिरफ्त में फंसा व्यक्ति आजीवन गीली लकड़ी की तरह धुआं देकर जलने पर विवश हो जाता है. कहा जाता है कि चिंता, चिता से भी बढ़कर दुख को प्रदान करने वाली होती है. चिता पर सोया व्यक्ति संसार की सभी चिंताओं से मुक्त हो जाता है,(Yog Dwara Tanav Se Mukti)परंतु चिंता की गिरफ्त में फंसा व्यक्ति आजीवन गीली लकड़ी की तरह धुआं देकर जलने पर विवश हो जाता है.

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चिंता क्या है, इसे तो सिर्फ चिंतित व्यक्ति ही महसूस कर सकता है, परंतु चिंता मुक्त होकर सिर्फ वही रह सकता है, जो इससे निपटने की युक्ति को जानता है. चिंता के मायाजाल से मुक्त होने के लिए कोई औषधि नहीं है\ खान पान, वेश भूषा, मान मर्यादा, बच्चों का भविष्य, स्वास्थ्य, बेटी का ब्याह, रहन-सहन की शैली, रिश्ते नातों के बीच सामंजस्य, दायित्व का निर्वाह आदि अनेक ऐसी बातें होती है, जो चिंता को उत्पन्न कर देती है.

जीवन में योग का विशेष महत्व Jivan Me Yog Ka Vishesh Mahatv

आत्मविश्वास में कमी, आलस्य, निष्क्रियता एवं शारीरिक या मानसिक दुर्बलता के कारणों से उत्पन्न होने वाली चिंता एक ऐसी कटीली झाड़ी होती है, जिसे काटने के लिए सहज बुद्धि ही नहीं अपितु विशिष्ट युक्ति अपनाने की आवश्यकता होती है. चिंता से उत्पन्न खतरा संपूर्ण भविष्य, दांपत्य जीवन, गृहस्थी का आनंद आदि के साथ ही व्यक्तित्व व शारीरिक प्रतिभा सुंदरता पर भी घुन लगाने वाला हुआ करता है(Yog Sharir Aur Mun Ka Vikash Karta hai)

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जिस प्रकार स्वाध्याय के अभ्यास से छात्रों की पढ़ाई, कंपीटिशन की तैयारी आदि में सफलता प्राप्त होती है, उसी प्रकार योगाभ्यास से चिंता की गहराई कम होती है(Yog se Mansik Labh) चिंता अगर बीमारी है तो अभ्यास उसकी औषधि. मन में दृढ़ संकल्प करके नियमित रूप से योगाभ्यास करने पर जहां आलस्य, थकावट कम होती है, वही उत्साह लगनशीलता, अभिरुचि एवं सभी प्रकार की मनोभावनाओं को बल मिलता हैYoga Dhyan Aur Chtan Ki ek Prakriya hai

योग के द्वारा अध्ययन में एकाग्रता Yog ke Dwara Adhyayan me Ekagrata

छात्रों की चिंता होती है कि अपने अध्ययन के प्रति दिमाग को किस प्रकार एकाग्रचित किया जाए? काम करने वालों की चिंता होती है कि किस प्रकार कम समय में ही अपने दायित्व को अच्छी तरह निपटा लिया जाए? रोगी की चिंता होती है कि किस प्रकार अति शीघ्र रोगमुक्त हुआ जाए? स्त्री की चिंता होती है कि फिटनेस के तहत किस प्रकार स्तनों का आकार प्रकार सुडौल बनाया जाए? पति की चिंता होती है किस प्रकार पत्नी को संपूर्ण यौन सुख प्रदान किया जाए? माता पिता की चिंता होती है कि किस प्रकार से अपने बच्चों का शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास किया जाए ताकि उसे चरित्र बल का विशेष ब्रह्मास्त्र प्रदान हो जाए? चिंताएं देखने में अनेक लगती है, परंतु इन सभी का उपचार सिर्फ एक ही है और वह है- ‘योगाभ्यास’(Yoga The Power Of Breath)

योग के द्वारा सांसारिक विषयों पर पकड़ Yog Ke Dwara Aansarik Vishayo par Pakdad

जहां सांसारिक विषयों के मार्ग में काम, क्रोध, लोभ, ईष्,र्या घृणा, द्वेष, अहंकार, असंतोष, स्वार्थ आदि के रूप में बाधक चिंताएं उपस्थित होती है, वहीं पर विवेक, सत्य अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्राचर्य, स्वच्छता, संतोष, कठिन परिश्रम, सेवा, प्रेम, क्षमा, दया, करुणा एवं मनोबल जैसी अनंत शक्तियां भी है जिन्हें सिर्फ योग के माध्यम से ही ग्रहण किया जा सकता है. योग का शाब्दिक अर्थ होता है- जोड़ना अर्थात संसार में व्याप्त अच्छे संस्कारों से अपने मन को जोड़ लेना.

योग विज्ञान के प्रमुख अंग Yog Vigyan ke Pramukh Ang

योगाभ्यास करने से पूर्व योग के प्रमुख भेदों की संक्षिप्त जानकारी आवश्यक है. योग विज्ञान के प्रधानतः चार प्रमुख अंग होते हैं, जिन्हें हठयोग, राजयोग, ज्ञानयोग एवं कर्म योग कहा जाता है.

हठयोग Hathyog हठ योग में विशेषकर शारीरिक क्रियाओं का अभ्यास होता है. इन प्रक्रिया को आसन, प्राणायाम, बंध और मुद्रा के नामों से जाना जाता है. आसनों के अभ्यास में कभी शरीर के खास अंग और कभी सारे शरीर को मोड़ना, घुमाना, तानना या स्थिर रखना पड़ता है. आसनों में लगभग चालीस आसन ऐसे होते हैं, जिनका प्रयोग अधिकतर किया जाता है. प्राणायाम की क्रिया में विशेष प्रकार से सांस लेना और छोड़ना पड़ता है. इसके कई प्रकार है, परंतु लगभग दस प्रकारों का ही विशेष अभ्यास किया जाता है. बंध की क्रियाओं का अभ्यास उन लोगों द्वारा किया जाता है, जिन्होंने आसनों एवं प्राणायामों का अभ्यास जान लिया हो. बंध की क्रियाओं के आठ प्रकार होते हैं. मुद्राओं के अभ्यास अधिकतर प्रचलित है.

राजयोग Rajyog राज योग का अभ्यास खासकर मानसिक शक्ति के विकास एवं नियंत्रण से संबद्ध होता है. धारणा, ध्यान और समाधि इसके प्रमुख अंग है. जब मन को किसी एक बिंदु पर केंद्रित किया जाता है, तो उसे ‘धारणा’ कहा जाता है. इसे ही एकाग्रचित होना भी कहा जाता है. चित्त को एकाग्र करके ‘ध्यान’ के माध्यम से चिंतन एवं मनन किया जाता है. जब पूर्ण तल्लीनता के साथ चिंतन एवं मनन में व्यक्ति डूब जाता है तो उसे ‘समाधि’ कहा जाता है. धारणा और ध्यान के सफल अभ्यासकर्ताओं के लिए समाधि का अभ्यास सुगम हो जाता है.

ज्ञानयोग Gyanyog योग विज्ञान में ज्ञान योग का बड़ा ही महत्व है. कपिल मुनि के अनुसार, उचित ज्ञान के अभाव के कारण व्यक्ति को चिंता या दुख होता है. चिंता से छुटकारा पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसे वस्तुओं का सम्यक् ज्ञान हो अर्थात यथार्थ ज्ञान.

कर्मयोग Karmyog इससे अपने कर्तव्य वैज्ञानिक ढंग से करने की शिक्षा मिलती है. मनोनुकूल फल प्राप्त करने के लिए काम करने में शारीरिक मेहनत के साथ साथ बुद्धि भी लगाने की आवश्यकता होती है. कर्म योग यही शिक्षा देता है कि महज शारीरिक या मानसिक मेहनत ही काफी नहीं है बल्कि उसके साथ साथ उचित विधि और समझ बूझ का भी होना आवश्यक होता है. योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति शरीर को पुष्ट बनाने के साथ ही धारणा, ध्यान और समाधि द्वारा मन को एकाग्रचित करके, ज्ञानयोग के माध्यम से सम्यक् (यथार्थ) ज्ञान प्राप्त करके, उचित विधि और समझ बूझ के साथ, आने वाली चिंताओं को दूर भगा डालते हैं. नियमित रूप से प्रातः काल यदि आधा घंटा भी योगाभ्यास किया जाए तो नि:संदेह कुछ ही दिनों में चिंताओं से मुक्त होकर अपना जीवन सार्थक बना सकते हैं.

योगाभ्याश का महत्व Yogabhyas Ka Mahatv

योगाभ्यास का एक उपयोगी पक्ष यह भी है कि व्यक्ति के जीवन को अनुशासित करता है. उसे अपनी शक्ति की पहचान हो जाती है और उसमें साहस, निर्भयता तथा स्वावलंबन आदि आ जाते हैं. योग का संबंध सौंदर्य तथा व्यक्तित्व से भी होता है. प्रायः यह देखा जाता है कि योगाभ्यास करने वालों के चेहरे, रूप रंग तथा शारीरिक बनावट में कांति एवं सुंदरता आ जाती है. योगाभ्यासियों में हीन भावना नहीं आ पाती है.

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