योग : मन-मस्तिष्क को करें शांत

yoga is start of healthy life

बढ़ती प्रतिस्पर्धा के इस दौर ने मानव के मन मस्तिष्क को तनाव और चिंता के बंधन में कैद कर दिया है. तकनीकी नवीनताओं से हमें बहुत लाभ तो हुए ही , पर यही हमारी स्वास्थ्य समस्याओं का मुख्य कारण भी बनी है. वातावरण में दिन ब दिन बढ़ रहे प्रदूषण के स्तर में मनुष्य के श्वसन तंत्र को अत्यधिक नुकसान पहुंचाया है.

इसका कारण है – जीवन शैली में असंतुलन. पहले जो समस्याएं 60-65 वर्ष की उम्र में होती थी, आज वहीं 30-35 वर्ष की आयु में हो रही है. अपनी जीवन शैली में योग और व्यायाम को सम्मिलित कर सभी स्वास्थ्य समस्याओं का निवारण संभव है…

शरीर को विषाक्त तत्वों से दूर रखना बहुत जरूरी होता है. कारण यह है कि शरीर में विषाक्त तत्वों की मौजूदगी जन्म देती है कई बीमारियों को. जीवन शैली में असंतुलन ने मनुष्य के शरीर को रोगों का आश्रय बना दिया है.

हर व्यक्ति किसी न किसी रोग से ग्रस्त है. किसी को अस्थमा है, किसी को कोलेस्ट्रोल, कोई मधुमेह से पीड़ित है तो कोई उच्च रक्तचाप से. ऐसा कहना भी गलत नहीं होगा कि हर कार्य को जल्द खत्म करने की होड़ में हमने स्वास्थ्य को पीछे छोड़ दिया है.

वातावरण में प्रदूषण बढ़ने के कारण अनेको श्वास संबंधी समस्याएं होती है; जैसे अस्थमा, ब्रौंकायटिस आदि. इनके इलाज के लिए हम न जाने क्या क्या तरीके अपनाते है, कितनी दवाइयां लेते हैं, पर हमारी परेशानी ज्यों की त्यों ही रहती है.

आधुनिक युग में जिंदगी में तनाव का स्तर बढ़ता ही जा रहा है. भागदौड़ की इस जिंदगी में तनाव हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है. किसी को अपने परिवार के पालन-पोषण की चिंता है, किसी को रिश्तों में आ रही दूरियों को मिटाने की चिंता है तो किसी को महंगाई की बढ़ती दरों की चिंता है.

यहां तक कि बच्चे भी इस तनाव से दूर नहीं. पढ़ाई, होमवर्क और कैरियर ने बच्चों को भी तनाव की गिरफ्त में लाकर खड़ा कर दिया है. चाहे अमीर हो या गरीब, हर किसी को जीवन में किसी न किसी विषय की चिंता सताती ही है.

पर क्या इस चिंता का कोई इलाज है? क्या कोई तरीका है जिससे मन को शांत किया जा सकता है? इस सवाल का जवाब है – हां! मस्तिष्क को राहत देने व मन को शांत करने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है – योग.

योग हमेशा से ही हमारी संस्कृति का एक अटूट हिस्सा रहा है. योग वह चिकित्सा पद्धति है जिसमें किसी भी रोग का उपचार प्रकृति के माध्यम से किया जाता है. प्रकृति से बढ़कर कोई डॉक्टर, कोई वैध नहीं है. यह प्रकृति ही है जो हमें रोगों से राहत दिलाने में सहायता करती है. श्वसन तंत्र से जुड़ी किसी भी समस्या के उपचार में योग श्रेष्ठ होता है इसके लिए योग में प्राणायाम का अभ्यास करने का वर्णन किया गया है.

प्राणस्य आयामः इत प्राणायाम.

श्वासप्रश्वसयो गतिविच्छेदः प्राणायाम..

अर्थात् प्रणायाम श्वास-प्रश्वास की गति को नियंत्रित करने की क्रिया है. प्राणायाम दो शब्दों – प्राण और आयाम – के संयोग से बना है. इसका शाब्दिक अर्थ है जीवन शक्ति को लंबा करना. इसकी दो मुख्य क्रियाएं हैं – भ्रामरी प्राणायाम और अनुलोम विलोम प्राणायाम.

मन को दे शांति भ्रामरी प्राणायाम

मन मस्तिष्क में संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से भ्रामरी प्राणायाम किया जाता है. प्राणायामों का राजा कहा जाने वाला भ्रामरी प्राणायाम समस्त अंगों को कार्यशीलता प्रदान करता है. यह योग शक्ति वर्धक होने के साथ ही शरीर की व्याधियों के उपचार में लाभकारी होता है. यह मस्तिष्क की चुंबकीय शक्ति और मानसिक शक्ति बढ़ाने के लिए हमारी नियंत्रण प्रणाली को मजबूत बनाता है. व्यक्ति को दीर्घायु बनाने के लिए यह शरीर की प्रमुख ग्रंथि अर्थात् पिट्यूटरी ग्रंथि या मास्टर ग्लैंड की शक्ति में वृद्धि करने के लिए शरीर में एसिड्स का संतुलन बनाए रखता है.

मन को शांत करने के लिए सबसे श्रेष्ठ है भ्रामरी प्रणायाम. मस्तिष्क से तनाव, गुस्सा, चिड़चिड़ापन दूर करने के लिए नियमित रूप से भ्रामरी प्राणायाम का अभ्यास उपयोगी होता है. मन को शांत करने और मस्तिष्क को तनाव मुक्त करने का एकमात्र उपाय है भ्रामरी प्रणायाम.

प्राणायाम करते समय भ्रमर अरथा भंवरे जैसी ध्वनि होने के कारण इसे भ्रामरी प्राणायाम कहा जाता है. भ्रमर की मधुर ध्वनि से संपूर्ण शरीर व मन को एक सुखद अनुभूति का एहसास होता है. योग की यह क्रिया शरीर और मन को परमानंद की ओर ले जाती हैं. शरीर के समस्त अंगों के लिए शक्तिवर्धक होने के अतिरिक्त यह मन की चंचलता को भी दूर करता है.

प्राणायाम से लाभ

यह तो मनुष्य के स्वभाव में होता है कि जब तक उसे किसी चीज के फायदों से अवगत न कराया जाए, तब तक वह उसका अभ्यास नहीं करता. ऐसे ही भ्रामरी प्राणायाम को करने के पूर्व इसके लाभों के बारे में जानकारी ले तो बेहतर होगा.

  • क्रोध, तनाव, चिंता जैसी मस्तिष्क की समस्या को दूर करें
  • माइग्रेन का दर्द कम करें
  • बुद्धि वर्धक
  • स्मरण शक्ति बढ़ाएं
  • मस्तिष्क में हो रहे रक्त के जमाव से राहत
  • उच्च रक्तचाप घटाएं
  • मन मस्तिष्क को शांत करता है जिससे अच्छी नींद आती है; अनिद्रा रोग में लाभ प्रद
  • थायरॉइड रोग में लाभकारी
  • आत्मविश्वास बढाए; नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर ले जाए
  • शरीर में ऊर्जा का संचार करें

यह पिट्यूटरी ग्लैंड की शक्ति को बढ़ाने के साथ पिनीय ग्लैंड के लिए भी फायदेमंद होता है. मन और शरीर को नियंत्रित करने के कारण यह प्राणायाम मानसिक तनाव को कम करता है. यह उत्तेजना को समाप्त करता है. इसका अभ्यास करने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है, ह्रदय रोगो मे लाभ, याददाश्त में वृद्धि और हिंसक प्रवृत्ति दूर होती है. नकारात्मक विचारों को दूर कर यह संपूर्ण शरीर में सकारात्मकता का संचार करता है. शरीर में रासायनिक संतुलन बनाकर भ्रामरी प्राणायाम अनिद्रा रोग दूर करने और कुण्डिलिनी जागरण में सहायक होता है. मस्तिष्क को तेज करने के साथ ही यह मस्तिष्क के स्नायु मंडल को बढ़ाता है और मस्तिष्क संबंधी विकारों से रक्षा करता है. मस्क्युलर डिस्ट्रॉफी, स्नायु तंत्र के व्याधियां और जैसी बीमारियों में भ्रामरी प्राणायाम लाभदायक होता है.

प्राणायाम की विधि

भ्रामरी प्रणायम को करने का श्रेष्ठ समय होता है सूर्योदय या सूर्यास्त. इस योग को पद्दासन, सुखासन, वीरासन या कुर्सी पर बैठकर अथवा सामान्य तौर पर खड़े होकर भी किया जा सकता है. ध्यान रहे आप जिस भी आसन में बैठे हो वह आरामदायक हो. अब मन को शांत कर दोनों आंखों को बंद कर ले. अपनी तनावपूर्ण जिंदगी की किसी भी चिंता को मस्तिष्क में प्रवेश न करने दे. अपने मेरुदंड को बिल्कुल सीधा रखें. हाथों को अपने कंधों के समांतर फैलाएं. कोहनियों से हाथ को मोड़ते हुए अंगूठो की मदद से कानों को बंद करें. फिर तर्जनी उंगली को माथे पर रखे और अन्य 3 (मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा) को आंखों पर. कमर, पीठ सिर को सीधा और स्थिर रखें. नाक से 10 सेकंड के लिए श्वास अंदर ले और 20-30 सेकंड में बाहर छोड़े. श्वास बाहर छोड़ते समय कंठ से भंवरे के समान आवाज आनी चाहिए. जब तक आप पूर्ण श्वास न छोड़ दे तब तक आवाज करते रहे. आवाज प्रक्रिया के अंत तक यह समान होना चाहिए. यह इस प्रणायाम का एक संपूर्ण चक्र होता है. शुरू में करीब 5 मिनट तक इसका अभ्यास करें और धीरे-धीरे अभ्यास के समय को बढ़ाते जाएं.

प्राणायाम का समय

प्रातः काल 10 चक्र, शाम को 10 चक्र का अभ्यास करें. स्नायु तंत्र की तकलीफों को दूर करने के लिए रोज प्रातः 50 चक्र और शाम को 30 चक्र का अभ्यास करें.

विशेष

प्राणायाम करते समय होने वाली भ्रमर के समान गूंजन की आवाज में एक तार होना चाहिए. यह बीच में टूटना नहीं चाहिए तथा मन को पिट्यूटरी ग्लैंड में लगाकर रखे. अपने मस्तिष्क में गूंजन की आवाज को महसूस करें.

शारीरिक प्रभाव

इस क्रिया को करते समय श्वास को लंबे समय तक खींचकर फिर बाहर छोड़ते हैं, इससे फेफड़ो की शक्ति में वृद्धि होती है. प्रक्रिया के समस्त पेशियों का उपयोग होने के कारण श्वास खींचते समय वह फेफड़ों के पूरे क्षेत्र में फैल जाती हैं. यह उन्हें क्रियाशील बनाता है. यह सभी क्षेत्रों में दबाव व एकरूपता लाती है, रक्त में अधिक मात्रा में ऑक्सीजन का संचार करती है, वही ऑक्सीजन रक्त के माध्यम से सभी कोशाणुओं को भी पहुंच जाता है. इस तकनीक से शरीर का रक्त प्रवाह सुचारू होता है. मस्तिष्क में रक्त की पूर्ति होने के कारण उसको विकास में कोई बाधा नहीं आती व निरंतर विकास चलता रहता है.

मस्तिष्क को करें संतुलित : अनुलोम विलोम प्राणायाम

नाड़ियों की शुद्धि और मजबूती ही अन्य अंगों की शुद्धि और मजबूती का आधार होती है. इसी से मस्तिष्क व हृदय की कार्य क्षमता सक्रिय बनी रहती है. वातावरण प्रदूषण के चलते यह जरूरी है कि हम समय रहते अपने शरीर की शुद्धि कर ले. इससे पहले हम किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हो जाए.

हृदय और फेफड़ों को स्वस्थ रखने का सर्वश्रेष्ठ उपाय हैं अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास करना. अनुलोम विलोम जिसमें अनु का अर्थ होता है सीधा और विलोम का उल्टा. इसमें सीधा अर्थात् नासिका का दायां छिद्र और उल्टा अर्थात् नासिका का बायां छिद्र है. नाड़ी संबंधी समस्त रोगों का उपचार करने की क्षमता होने के कारण इसे नाड़ी शोधन प्राणायाम भी कहा जाता है. इस प्राणायाम के माध्यम से नाड़ियों की सफाई होती है और व्याधियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है.

इसमें श्वास लेने की क्रिया को बार बार दोहराया जाता है. फेफड़ों में हवा का संपूर्ण संचार होने के कारण शरीर में ऑक्सीजन और कार्बनडाईऑक्साइड की मात्रा संतुलित रहती है. इससे सभी अंगो को आवश्यक पोषण मिलता है.

निरोग शरीर के लिए यह सर्वोत्तम योग है. मस्तिष्क के विकास के लिए अनुलोम विलोम लाभकारी होता है. यह मन मस्तिष्क से नकारात्मक विचारों को निकाल सकारात्मकता का संचार करता है. मन की चंचलता को नियंत्रित करने में अनुलोम विलोम प्राणायाम लाभप्रद होता है. इससे मानसिक संतुलन और एकाग्रता की प्राप्ति होती है.

विधि

अनुलोम विलोम प्राणायाम में 3 क्रियाएं होती है – पूरक, कुंभक और रेचक. पूरक का अर्थ होता है श्वास लेना और रेचक का अर्थ है श्वास छोड़ना. पूरक और रेचक के बीच के समय में जब कुछ क्षण के लिए श्वास को रोक कर रखा जाता है, उस क्रिया को कुंभक कहते हैं.

अनुलोम विलोम प्रणायाम को करने के लिए वज्रासन को छोड़ किसी भी सुखासन जैसे पालथी बना कर बैठ जाए और आंखें बंद कर ले. अपने बाएं हाथ को घुटने पर रखे व दाएं हाथ के अंगूठे दायीं नासिका को बंद कर तर्जनी और मध्यमा को भूमध्य पर रख लें. बायीं नासिका से धीरे धीरे श्वास अंदर ले और फिर उसी गति में श्वास बाहर निकालें. उसके बाद बाए हाथ के अंगूठे से उसी प्रकार बायीं नासिका को बंद कर यह प्रक्रिया दोहराएं. ऐसे कुल 6 चक्र होने चाहिए. अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी श्वास-प्रश्वास की गति को घटा और बढ़ा सकते हैं. किसी भी स्थिति में तनाव और थकान महसूस नहीं होना चाहिए. इसका अभ्यास हमेशा स्वस्थ रहने के लिए 5 मिनट तक करना चाहिए. श्वास का अनुपात 1:1 होना चाहिए.

अनुलोम विलोम प्राणायाम का अभ्यास (अन्र्त कुंभक स्थिति में) :

इसमें दाए अंगूठे से दायीं नासिका को बंद कीजिए बायीं नासिका से पूरक कीजिए. पूरक के अंत में दोनों नासिका को बंद कीजिए. फिर मन में अपनि सामर्थ्य के अनुसार अधिकतम 8 तक गिनती करें. इस अंतराल श्वास को रोके रखें. फिर दाई नासिका से श्वास बाहर छोड़े (रेचक). इसी प्रक्रिया को परिवर्तित कर बाईं नासिका को बंद कीजिए और दायीं नासिका से श्वास लीजिए. पुनः दोनों नासिका को बंद करके अधिकतम 8 गिनती तक श्वास रोके. अब नासिका को बंद रखिए और बायीं नासिका से श्वास बाहर करते हुए रेचक कीजिए. यह एक चक्र होता है. इसके अधिकतम 20 चक्र का अभ्यास करें.

लाभ

  • मन की एकाग्रता बढ़ाएं
  • मानसिक तनाव दूर करें
  • यह शरीर के प्राणमार्ग को खोलता है
  • शरीर में ऑक्सीजन की अतिरिक्त आपूर्ति को बढ़ाता है. इससे फेफड़ो की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है.
  • रक्त को शुद्ध करता है
  • उच्च रक्तचाप और मोटापे की समस्या में लाभप्रद
  • आंखों की रोशनी बढ़ाए
  • शरीर स्वस्थ और बलवान बनाए
  • कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करें
  • मस्तिष्क की कोशिकाओं को शुद्ध करें
  • इसके अभ्यास से सर्दी, जुकाम, अस्थमा, साइनस, जोड़ों के दर्द में लाभ पहुंचता है.

विशेष

इस प्राणायाम में दोहराई जाने वाली श्वास लेने की क्रियाएं कोशिकाओं की शुद्धि का कार्य करती है. इसके अतिरिक्त यह सांस की तकलीफों को दूर करने में भी सहायक होता है. शरीर में ज्यादा से ज्यादा हवा का संचलन होने के कारण विषाक्त तत्व निष्कासित होते हैं.

सावधानियां

उच्च रक्तचाप एवं हृदय रोगी मार्गदर्शन में करें, अन्यथा लाभ की जगह हानि भी हो सकती है.

समस्त गृहस्थ लोग इसका अभ्यास 5-10 मिनट से ज्यादा न करें, अन्यथा आगे जाकर यहीं प्राणायाम नुकसानदायक हो जाता है.

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